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Rajasthan Politics: राजस्थान में आखिर कमल मुरझा क्यों गया? जानिए BJP की 11 सीटें हारने के कारण

Rajasthan Politics: राजस्थान में भाजपा को लोकसभा चुनाव में जोर का झटका बहुत जोर से लगा। लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद नेता-कार्यकर्ता सकते में हैं।

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अनंता मिश्रा

राजस्थान में भाजपा (Rajasthan BJP) को लोकसभा चुनाव में जोर का झटका बहुत जोर से लगा। कांग्रेस से अधिक सीटें जीतकर भी भाजपा मायूस है। नेता-कार्यकर्ता सकते में हैं। भाजपा के पक्ष में मतदान करने वाले लोग भी ग्यारह सीटें हारने की सच्चाई को पचा नहीं पा रहे। उम्मीदें आसमान पर थी, लेकिन नतीजों ने जमीन पर ला दिया। भाजपा के नेता इस ‘जीत-हार’ का अपने-अपने तरीके से विश्लेषण करेंगे। अपनी-अपनी खाल बचाते हुए? पूरे चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी कहीं नजर ही नहीं आई। मोदी के नाम के सहारे प्रत्याशी रणक्षेत्र में अकेले जूझते नजर आए।

प्रदेशाध्यक्ष सी.पी. जोशी चित्तौड़गढ़ की सरहद में फंसे रहे! केंद्रीय मंत्री अपनी-अपनी सीटों को निकालने की जुगत में लगे रहे। पार्टी के प्रदेश प्रभारी अरुण सिंह पूरे चुनाव के दौरान राजस्थान में नजर ही नहीं आए। मानो उन्हें यहां आने से रोक दिया हो। संगठन महासचिव चंद्रशेखर को लोकसभा चुनाव से पहले दूसरे राज्य की जिम्मेदारी सौंप दी गई, लेकिन राजस्थान में संगठन को संभालने की जिम्मेदारी किसी को नहीं दी गई। ऐसे में चुनाव प्रचार अभियान जोर पकड़ता तो कैसे? पहली बार भाजपा, भाजपा की तरह चुनाव लड़ती नजर आई ही नहीं। अकेले मुख्यमंत्री सभी 25 सीटों पर कमल खिलाने के लिए जोर लगाते रहे।

टिकट वितरण में किसकी चली, शायद ही कोई जानता हो? लगातार तीन चुनाव हार चुकी ज्योति मिर्धा को नागौर से पार्टी टिकट किसने दिलाया और क्यों? दो बार से लगातार चूरू सीट भाजपा की झोली में डाल रहे राहुल कस्वां का टिकट किसने कटाया और क्यों? बस्सी के कन्हैया लाल मीणा को दौसा में पार्टी का टिकट थमाया, किसने और क्यों? बांसवाड़ा सीट पर कांग्रेस से आए महेन्द्रजीत सिंह मालवीय को टिकट क्यों दिया?

भाजपा ने उन्हें टिकट थमाकर सबको चौंका दिया तो मतदाताओं ने भी पिछली बार तीन लाख वोटों से जीती भाजपा को ढाई लाख वोट से पटकनी देकर चौंका दिया। हिसाब हाथों-हाथ बराबर कर दिया। राजपूत, जाट और आरक्षण के मुद्दे पर चुनाव के दौरान घमासान मचा रहा, लेकिन इस पर स्पष्टीकरण देने वाला कोई नजर नहीं आया। भाजपा की झोली से वोट खिसकते रहे, लेकिन हवा में उड़ रही भाजपा को ये फिसलन नजर ही नहीं आई।

राज्य के एक वरिष्ठ मंत्री ने चलते चुनाव के बीच बार-बार इस्तीफे की धमकी देकर पार्टी को हास्यापद स्थिति में लाते रहे। लेकिन उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था। दस साल राज्य की मुख्यमंत्री रही वसुंधरा राजे का राज्य में जिस तरह उपयोग किया जाना चाहिए था, शायद नहीं किया गया। सबसे अहम सवाल ये कि पहली बार संघ भाजपा के लिए हमेशा की तरह खुलकर मैदान में उतरा क्यों नहीं? संघ के पर्दे के पीछे से सक्रिय न होने के कुछ तो कारण रहे होंगे?

इन कारणों का ईमानदारी से विश्लेषण किए बिना हार की जमीनी सच्चाई का कारण नहीं मिलेगा। हार के कारणों और हार के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान भी करनी होगी। सिर्फ मोदी के नाम के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की मानसिकता से भी ऊपर उठना होगा। अभी नगर निकाय और पंचायतों के चुनाव आने वाले हैं। समय रहते नहीं संभले तो फिसलन और गहरी हो सकती है।