
चांदनी चौक सिटी पैलेस स्थित देवस्थान विभाग का आनंद कृष्ण बिहारी मंदिर क्षतिग्रस्त। फोटो: पत्रिका
जयपुर। जयपुर सहित प्रदेशभर में देवस्थान विभाग के जिम्मे राजस्थान के करीब 900 राजकीय मंदिरों, हजारों सार्वजनिक प्रन्यासों और लाखों श्रद्धालुओं की आस्था को संभालने की जिम्मेदारी है। हालात यह हैं कि सुरक्षा, दान, विकास, कोर्ट केस और निगरानी तंत्र आधी से भी कम ताकत पर टिका हुआ है। जयपुर के ही मुख्यालय के दो किमी परिधि में कई मंदिर जर्जर हैं। कभी भी यहां हादसा हो सकता है। ऐसे ही हालात विभाग के अधीन प्रदेशभर और अन्य राज्यों के मंदिरों में हैं।
16 साल से कैडर रिव्यू के बिना चल रहा यह विभाग 52 प्रतिशत रिक्त पदों के साथ राजस्थान की आस्था को संभालने की कोशिश कर रहा है। नतीजा-एक अफसर पर सात–आठ जिलों का बोझ और व्यवस्था पर लगातार बढ़ता दबाव। ऐसे में मंदिरों की देखरेख करने वाला देवस्थान विभाग आज खुद भगवान भरोसे खड़ा है।
पर्याप्त स्टाफ नहीं होने का सबसे बड़ा असर उस धन और संपत्ति पर पड़ रहा है, जिसे श्रद्धालु भगवान के चरणों में अर्पित करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सोसायटी एक्ट से जुड़े कई संस्थानों का दायित्व भी इसी विभाग पर आ गया है। यानी भगवान के नाम से संचालित संस्थाएं दोगुनी हो गईं, लेकिन उन्हें संभालने वाले हाथ आधे रह गए।
दान पेटियों की राशि का लेखा परीक्षण, मंदिरों की जमीनों का रिकॉर्ड, संपत्तियों का सत्यापन और ऑडिट जैसे जरूरी काम समय पर नहीं हो पा रहे हैं। कई स्थानों पर वर्षों से ऑडिट लंबित हैं। नए जिले बनने से प्रशासनिक ढांचा भले ही बदल गया हो लेकिन देवस्थान विभाग के कार्यालय आज भी संभाग स्तर पर ही सिमटे हुए हैं। जिला स्तर पर विभाग का कोई स्वतंत्र कार्यालय नहीं है। अराजकीय मंदिरों से जुड़े विवाद भी इन्हीं अधिकारियों को देखने पड़ते हैं।
राज्य सरकार की बजट घोषणाओं से देवस्थान विभाग पर जिम्मेदारी और बढ़ गई है। 100 से अधिक मंदिरों के जीर्णोद्धार और नवनिर्माण का कार्य पर्यटन विभाग से हटाकर देवस्थान विभाग को सौंप दिया गया है। धार्मिक उत्सवों और आयोजनों का बजट भी इसी विभाग के पास है। कई योजनाएं फाइलों में ही भगवान भरोसे पड़ी हैं। इसके अलावा वरिष्ठ नागरिक तीर्थ यात्रा योजना का दायरा भी साल दर साल बढ़ने के बावजूद कोई नया अधिकारी नहीं लगाए गए।
—वर्ष 2009 के बाद 16 साल से देवस्थान विभाग का नहीं हुआ कोई कैडर रिव्यू
—18 साल पहले सार्वजनिक प्रन्यासों की संख्या करीब 6100 थी। अब बढ़कर लगभग 13 हजार तक
—विभाग के 469 स्वीकृत पदों में से 251 पद वर्षों से रिक्त
—कई शिकायतें महीनों तक लंबित, मंदिरों का निरीक्षण भी प्रभावित
Published on:
06 Mar 2026 03:17 pm
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