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‘एक हनुमान बंदर, एक लाल मुंह का बंदर’, राजस्थान विधानसभा में ‘बंदरों’ पर क्यों हुई चर्चा, मंत्री ने भी दिया कमाल का जवाब

राजस्थान विधानसभा में इन दिनों जनता से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर गरमागरम बहस देखने को मिल रही है। इसी कड़ी में जयपुर के शाहपुरा और पूरे प्रदेश में बंदरों के बढ़ते आतंक का मुद्दा सदन में गूँजा। कांग्रेस विधायक मनीष यादव के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर भजनलाल सरकार के वरिष्ठ मंत्री झाबर सिंह खरा ने जो जवाब दिया, उसने न केवल समस्या की गंभीरता को दर्शाया, बल्कि बंदरों के बदलते व्यवहार और सरकारी तंत्र की लाचारी को भी उजागर किया।

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जयपुर। पिंक सिटी जयपुर सहित राजस्थान के ग्रामीण और शहरी इलाकों में बंदरों का आतंक अब एक गंभीर संकट बन चुका है। विधानसभा में शाहपुरा विधायक मनीष यादव ने जब इस मुद्दे को उठाया, तो स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खरा ने विस्तार से जवाब देते हुए इसके पीछे के मनोवैज्ञानिक और पारिस्थितिक कारणों को सदन के सामने रखा। मंत्री ने स्पष्ट किया कि मानवीय हस्तक्षेप और जंगलों में बढ़ती हलचल ने बंदरों को शहरों की ओर पलायन करने पर मजबूर कर दिया है।

पूर्वजों से लेकर 'मदारी' तक का सफर

मंत्री झाबर सिंह खरा ने जीव विज्ञान का हवाला देते हुए कहा कि लाल मुँह के बंदर और हनुमान लंगूर मानव के पूर्वज माने जाते हैं। उन्होंने पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए कहा, "आज से 50-60 साल पहले बच्चों को बंदर दिखाने के लिए मदारी साल में दो-चार बार आता था, लेकिन आज परिस्थितियां बदल गई हैं। अब ये हमारे पूर्वज इतने 'उच्छृंखल' हो गए हैं कि रसोई में घुसकर बर्तनों की तोड़फोड़ करना, कपड़े फाड़ना और बच्चों-बुजुर्गों पर हमला करना आम बात हो गई है।"

गलता जी और सामोद : क्यों छोड़ा बंदरों ने अपना घर?

मंत्री ने बताया कि जयपुर का गलता जी, सामोद के वीर हनुमान मंदिर, सरिस्का और सवाई माधोपुर के गणेश मंदिर बंदरों के मूल निवास स्थान रहे हैं।

  • भोजन का संकट: पहले श्रद्धालु यहाँ चने और केले खिलाकर उनका पेट भरते थे। लेकिन बंदरों की जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई और श्रद्धालुओं की संख्या उस अनुपात में नहीं बढ़ी।
  • मानवीय घुसपैठ: जंगलों में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के कारण बंदरों ने सुरक्षित स्थानों की तलाश में कस्बों और शहरों की ओर पलायन शुरू कर दिया।

शाहपुरा का रिपोर्ट कार्ड : लाखों खर्च, फिर भी नतीजा सिफर?

सदन में शाहपुरा तहसील का डेटा रखते हुए मंत्री ने बताया कि साल 2019 से अब तक हजारों बंदरों को पकड़ा जा चुका है:

  • 2019-20: 664 बंदर पकड़े गए (खर्च: ₹4.79 लाख)
  • 2021-22: 919 बंदर पकड़े गए (खर्च: ₹4.83 लाख)
  • कुल आँकड़ा: 2019 से अब तक कुल 2084 बंदरों को पकड़कर जंगलों में छोड़ा गया, जिस पर करीब ₹13.32 लाख का भुगतान किया गया। मंत्री ने स्वीकार किया कि यह एक 'कटु सत्य' है कि ठेकेदार बंदरों को पकड़कर जंगल में छोड़ता है, लेकिन सप्ताह भर के भीतर वे फिर से किसी दूसरे शहर या गाँव में पहुँच जाते हैं।

जिम्मेदारी की 'फुटबॉल' बना बंदरों का मुद्दा

सदन में चर्चा के दौरान एक बड़ा खुलासा यह हुआ कि बंदरों की समस्या का समाधान किस विभाग की जिम्मेदारी है, इसे लेकर भ्रम की स्थिति है।

  • वन विभाग बनाम स्वायत्त शासन: अमूमन वन विभाग इन्हें वन्यजीव मानकर पल्ला झाड़ लेता है, जबकि पंचायत राज और नगरीय निकाय इसे वन विभाग का मामला बताते हैं।
  • कलेक्टर को पावर: मंत्री ने 18 फरवरी 2000 की अधिसूचना का हवाला देते हुए साफ किया कि राज्य के समस्त जिला कलेक्टरों को बंदरों और लंगूरों के संबंध में प्राधिकृत अधिकारी नियुक्त किया गया है। अब कलेक्टरों को ही इन समस्याओं का निस्तारण सुनिश्चित करना होगा।

अटल वन (संजय वन) और नई घेराबंदी

जयपुर के संजय वन (अब श्री अटल वन) में बंदरों के पुनर्वास के लिए कई कदम उठाए गए हैं:

  • दीवार की ऊंचाई बढ़ाकर सोलर फेंसिंग और चेन लिंक जाली लगाई गई है।
  • बंदरों के भोजन के लिए वन क्षेत्र में फलदार पौधे विकसित किए जा रहे हैं।
  • खाद्य पदार्थ डालने वालों पर निगरानी के लिए गश्त की व्यवस्था की गई है।

विधायकों से मांगे सुझाव: क्या है समाधान?

मंत्री खरा ने सदन में सभी विधायकों से लिखित सुझाव मांगे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि समस्या इतनी व्यापक है कि इसे पूरी तरह हल करना मुश्किल है, लेकिन सतत पकड़-धकड़ और वन क्षेत्रों में भोजन की व्यवस्था कर इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।