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Krishna Janmashtami 2024: राजस्थान के इस मंदिर में 364 दिन तक राम… एक दिन बन जाते हैं श्रीकृष्ण

Krishna Janmashtami : लक्ष्मणगढ़ के श्रीरघुनाथजी का बड़ा मंदिर में साल के 364 दिन प्रतिमा को भगवान श्रीराम के रूप में पूजते हैं, लेकिन कृष्ण जन्माष्टमी के दिन प्रतिमा को भगवान कृष्ण के रूप में पूजते हैं। यह परंपरा 215 सालों से चली आ रही है।

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Janmashtami Photo

Krishna Janmashtami : जयपुर। इन दिनों 'नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की' की गूंज हर तरफ सुनाई दे रही है। जन्माष्टमी के महापर्व की तैयारियों में श्रद्धालु अपने घरों और मंदिरों में जुट गए हैं। 26 अगस्त को भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। हम आपको ऐसी धार्मिक यात्रा पर लेकर चल रहे हैं। जिसमें आपको मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम और 16 कलाएं प्राप्त भगवान श्री कृष्ण के एक साथ दर्शन कराएंगे। लक्ष्मणगढ़ के श्रीरघुनाथजी का बड़ा मंदिर में साल के 364 दिन प्रतिमा को भगवान श्रीराम के रूप में पूजते हैं, लेकिन कृष्ण जन्माष्टमी के दिन प्रतिमा को भगवान कृष्ण के रूप में पूजते हैं। यह परंपरा 215 सालों से चली आ रही है।

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मंदिर के महंत अशोक रघुनाथदास महाराज बताते हैं, भगवान श्री राम के श्री विग्रह से धनुष बान हटाकर उनके हाथों में बांसुरी धारण कराई जाती है, साथ ही मुकुट भी मोर पंख सहित धारण कराया जाता है। जन्मोत्स्व के बाद महाआरती के दौरान पुष्प वर्षा होती रहेगी। पंजीरी, पेडा ,पंचामत आदि का भोग लगाकर आरती की जाएगी। इस अवसर पर भक्तों के लाए गए खिलोंने आदी की उछाल की जाती है। कार्यक्रम में उपस्थित सभी भक्तों को प्रसाद दिया जाता है।

इस परंपरा के पीछे की कारण यहीं है कोई भी धार्म​क ग्रंथ इनमें भेद नहीं बताते है। इसलिए कृष्ण जन्माष्टमी पर राम की प्रतिमा का कृष्ण का रूप दे दिया जाता है। जन्माष्टमी पर भगवान के श्री विग्रह को पुन: गर्भ गृह में स्थाप​ति कर बाल रुप में भगवान श्री कृष्ण मनमोहक झांकी सजाई जाएगी। भगवान श्री कृष्ण खास तोर पर वृदांवन से पोशाक आती हैं।

1805 ईस्वी में मंदिर-लक्ष्मणगढ़ किले की नींव एक साथ रखी गई थी

1805 ईस्वी में मंदिर व लक्ष्मणगढ़ के किले की एक साथ नींव रखी गई थी। इसका निर्माण नगर के संस्थापक नरेश राव राजा लक्ष्मण सिंह के द्वारा करवाया गया था। मंदिर के निर्माण के बाद 1814 ईस्वी में मंदिर में मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा करवाई गई। राजाओं के जमाने में राव राजा लक्ष्मण सिंह से लेकर अंतिम राव राजा कल्याण सिंह तक जब भी राजा रामगढ आदी ​की यात्रा करते तो बीच में लक्ष्मणगढ आने के कारण मंदिर में श्री रघुनाथ के दर्शन कर महंत महाराज से आशीर्वाद स्वरुप रेशमी दुप्टटा, प्रसाद आदी लेकर अपनी गंतव्य की ओर बढते थे।

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108 कलशों और वैदिक मंत्रों के उच्चारण से होगा अभिषेक

जन्माष्टमी के अवसर पर रात 9 बजे से 11 बजे भगवान के श्रीविग्रह को गर्भ गृह के बाहर विराजमान कर तांबे की बडी पारात में सहस्त्र धारा के नीचे विराजमान कर 108 कलशों से विभिन्न पुजा की सामग्रियों द्वारा वैदिक पुरुष सूक्त मंत्रों से अभिषेक किया जाएगा। पुन: प्रतिमा को गर्भगृह में विराजमान कर बाल रूप में भगवान श्री कृष्ण की आकर्षक झांकी सजाई जाएगी। जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर परसिर में भजनों की सरिता 8 बजे से लेकर रात्री 1 बजे तक बहती रहेगी। रात 12:30 बजे बाल रूप कृष्ण की महाआरती होगी। आरती के दौरान पुष्प वर्षा होती रहेगी। इस दौरान बाल रूप श्रीकृष्ण की मटकी फोड़ कार्यक्रम भी होगा।