
कोप्पल. मुनि अनंत कुमार ने उत्तराध्ययन सूत्र के ‘सम्यक् पराक्रम’ अध्ययन पर प्रवचन करते हुए कहा कि धर्म-साधना कभी भी प्रतिफल, प्रतिष्ठा अथवा भौतिक लाभ की अपेक्षा से नहीं करनी चाहिए। निष्काम भाव से की गई साधना ही आत्मा को निर्मल बनाकर आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में ले जाती है। उन्होंने कहा कि चौबीस तीर्थंकर आध्यात्मिक जगत के सर्वोच्च साधक और मार्गदर्शक हैं। उन्होंने मानव हृदय में धर्म-तीर्थ की स्थापना कर विचारों की धारा को सद्मार्ग की ओर मोड़ा। उनकी करुणा और साधना समस्त जीवों के लिए प्रेरणास्रोत है। मुनि अनंत कुमार ने कहा कि जैन परंपरा में ‘लोगस्स’ की स्तुति के माध्यम से चौबीस तीर्थंकरों के गुणों का स्मरण किया जाता है। इससे आत्मा की विशुद्धि और सम्यक्त्व की दृढ़ता होती है। स्तुति करते समय किसी इच्छा अथवा लाभ की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। साधक को इतना तल्लीन होना चाहिए कि स्तुति, स्तुतिकर्ता और स्तुत्य के बीच का भेद मिट जाए। उन्होंने अकबर-तानसेन के प्रसंग से निष्काम भक्ति का महत्व समझाया। इस अवसर पर तेरापंथ महिला मंडल ने रात्रिकालीन एक मिनट प्रतियोगिता आयोजित की। 99 प्रतिभागियों को छह समूहों में बांटा गया। संभव समूह प्रथम, अजीत समूह द्वितीय और अभिनंदन समूह तृतीय रहा। पारसमल जीरावाला परिवार की ओर से विजेताओं को पुरस्कार दिए गए।
Updated on:
05 Sept 2026 03:21 pm
Published on:
26 Aug 2026 06:01 am
