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RGHS में मानसिक रोग और ऑटिज्म की दवाएं खत्म, इलाज करवाने वाले बच्चों पर पड़ रहा बुरा असर

राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (आरजीएचएस) के तहत मानसिक रोग, ऑटिज्म और न्यूरो डेवलपमेंटल डिसऑर्डर से जुड़ी जरूरी दवाओं की अनुपलब्धता ने हजारों परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। यह संकट अब केवल सप्लाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन बच्चों और मरीजों की जिंदगी पर भारी पड़ रहा है जिनकी पढ़ाई, नौकरी और सामाजिक जीवन इन दवाओं पर निर्भर है।

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जयपुर

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Arvind Rao

May 16, 2026

RGHS Drug Crisis

RGHS Drug Crisis (Patrika File Photo)

RGHS Drug Crisis: राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (RGHS) के तहत मिलने वाली मानसिक रोग, ऑटिज्म और न्यूरो की जरूरी दवाओं की किल्लत ने हजारों परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। यह संकट अब इतना गंभीर हो गया है कि दवाओं की कमी का सीधा असर बच्चों और मरीजों की जिंदगी पर पड़ रहा है। जो बच्चे इन दवाओं के सहारे सामान्य जीवन जी रहे थे, उनकी पढ़ाई और सामाजिक जिंदगी अब दांव पर लग गई है। साथ ही साथ परिजन भी दवा संकट को लेकर बेहद चिंतित हैं।

अभिभावकों का कहना है कि आरजीएचएस (RGHS) स्टोर पर कई जरूरी दवाएं या तो मिल नहीं रही हैं, या फिर उन्हें राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम से बाहर किए जाने की बात कही जा रही है। इसका नतीजा यह हुआ है कि जिन बच्चों की दवाएं अचानक बंद हुईं, उनके व्यवहार में भारी बदलाव आ गया है। बच्चों में गुस्सा, चिड़चिड़ाहट और नींद न आने की समस्या बहुत ज्यादा बढ़ गई है। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि कुछ बच्चों ने स्कूल जाना तक छोड़ दिया है।

क्या है विशेषज्ञों की चेतावनी, दवा रुकने से बिगड़ेगी हालत?

मानसिक रोग विशेषज्ञों का कहना है कि ऑटिज्म, एडीएचडी, एंग्जायटी और डिप्रेशन की दवाएं आम बीमारियों की दवाओं जैसी नहीं होती हैं। इन दवाओं का एक निश्चित कोर्स और समय होता है। अगर इनका डोज बीच में छूट जाए या अचानक दवा बदल दी जाए, तो मरीज की स्थिति पहले से भी ज्यादा बिगड़ने (रिलैप्स होने) का खतरा रहता है।

इस गंभीर संकट को देखते हुए ऑटिज्म के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था 'सपोर्ट फाउंडेशन फॉर ऑटिज्म एंड डेवलपमेंटल डिसएबिलिटीज' ने कदम उठाया है। संस्था ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख शासन सचिव को पत्र लिखकर इस मामले में तुरंत दखल देने की मांग की है, ताकि पीड़ित परिवारों को जल्द से जल्द राहत मिल सके।

ये दिक्कतें और मांग

  • कई मरीजों को निजी मेडिकल स्टोर से महंगी दवाएं खरीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
  • दवा की आपूर्ति रुकने से बच्चों का व्यवहार संभालना अभिभावकों के लिए मुश्किल हो गया है।
  • मानसिक रोगों की दवाओं को 'आवश्यक सतत दवा' श्रेणी में शामिल किया जाए।

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