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गले की हड्डी बना नए प्रदेश अध्यक्ष का चयन, इस चक्रव्यूह में फंसी भाजपा

प्रदेशाध्यक्ष की दौड़ में अब तक 5 नाम सामने आए हैं।

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bjp

जयपुर। चुनावी साल में भाजपा ने प्रदेशाध्यक्ष से इस्तीफा तो ले लिया लेकिन अब केन्द्रीय नेतृत्व के लिए राज्य में जातीय समीकरण साधना गले की हड्डी बन गया है। राज्य की कमान नए हाथों में सौंपने से पहले पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि चुनाव में अध्यक्ष की जाति का कहीं खामियाजा न उठाना पड़े।

पार्टी ने जाति-वर्ग के आधार पर 5 नाम सूचीबद्ध किए हैं। अब समस्या यह है कि इन वर्गों में भी जातिगत प्रतिद्वंद्विता है। इससे बचना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है। कुल मिलाकर भाजपा जातिगत समीकरण के चक्रव्यूह में फंस गई है।

इससे निकलने के लिए अब पार्टी चुनाव अभियान समिति का सहारा लेने पर विचार कर रही है ताकि एक जाति को पार्टी की कमान और उसकी प्रतिद्वंद्वी जाति को अभियान समिति के संयोजक का दायित्व देकर संतुलन साध सके।

हालांकि इसमें समस्या यह है कि पार्टी ने समिति बनाने का निर्णय तो राज्य में शक्ति संतुलन थामने के लिए किया है लेकिन इसका उपयोग जातीय समीकरण साधने के लिए करना पड़ा तो उसका औचित्य खत्म हो जाएगा।

अभियान समिति को लेकर पार्टी की मूल सोच है कि राज्य में ऐसे त्रिकोणीय शक्ति स्तूप बनाए जाएं कि संगठन पर किसी एक की पकड़ अंतिम न हो। इससे राज्य की इकाई में केन्द्रीय नेतृत्व का सीधा दखल भी बना रहेगा।


क्यों मचा है घमासान
प्रदेशाध्यक्ष की दौड़ में अब तक 5 नाम सामने आए हैं। इनमें सामान्य वर्ग से केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत व एलएन दवे, दलित वर्ग से केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल, ओबीसी वर्ग से भूपेन्द्र यादव एवं सतीश पूनिया शामिल हैं। सभी नामों में किसी न किसी खेमे का अंदरखाने विरोध देखने को मिल रहा है। पार्टी को इस मामले में दलित एवं सामान्य वर्ग की नाराजगी की चिंता भी है।


एक रास्ता यह भी
प्रदेशाध्यक्ष को लेकर जातिगत समीकरण नहीं बैठने पर पार्टी ने दो नामों को सुरक्षित रखा है। इनमें से एक केबिनेट मंत्री अरुण चतुर्वेदी, जो पहले पार्टी के अध्यक्ष रह चुके हैं। दूसरे केबिनेट मंत्री श्रीचंद कृपलानी, जो पुराने अध्यक्ष अशोक परनामी के सिंधी पंजाबी समाज से ही हैं।

इसलिए नजर
पार्टी के सामने समस्या यह भी है कि केन्द्रीय नेतृत्व जिसे अध्यक्ष बनाना चाहता है उस नाम पर मुख्यमंत्री राजी नहीं हो रहीं। मुख्यमंत्री ने जो नाम दिए हैं, वे अमित शाह को पसंद नहीं आ रहे। ऐसे में पार्टी कार्यकर्ताओं की नजर खास तौर पर इस पर है कि राज्य की सहमति को तवज्जो दी जाती है या केंद्र अपनी पसंद के नाम पर मुहर लगाएगा। लोगों का मानना है कि केन्द्रीय नेतृत्व ने अध्यक्ष भेजा तो राज्य में भाजपा दो गुटों में बंट जाएगी।