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… और अलविदा कह गया रंगमंच का ये शिक्षक, हज़ारों स्टूडेंट्स को थियेटर के गुर सिखाकर बन गए थे सैंडी बॉस

शिक्षक दिवस से ठीक एक दिन पहले संदीप के चले जाने से राजस्थान के रंगमंच को अपूरणीय क्षति हुई है।

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sandeep madan

-अमित शर्मा-

आज टीचर्स डे के दिन उन हजारों बच्चों ने जब अखबार उठाया होगा या सुबह सुबह फेसबुक टाइमलाइन चैक की होगी, जो संदीप के स्टूडेंट रहे हैं, अपना आपा खो बैठे होंगे। टीचर्स डे के ठीक एक दिन पहले संदीप मदान चले गए। न कोई उम्र थी, न बीमारी... पर वो चले गये... अब जवाहर कला केन्द्र जाना होगा तो मन नहीं लगेगा। ऐसा नहीं है कि हर बार संदीप से मिलना होता ही था, पर मिल जाते थे तो दिल खिल जाते थे। मेरे जैसे कितने ही लोग उन्हें सैंडी बुलाते थे, सैंडी बॉस।



संदीप से मेरी मुलाकात 1994 से है। मेरा थिएटर का ये तीसरा साल था। संदीप जवाहर कला केन्द्र के समर कैंप में बतौर असिस्टेंट इंस्ट्रक्टर शामिल हुए थे। सरताज नारायण माथुर रंगमंच निदेशक थे। मेरी उम्र 12 साल रही होगी, लिहाजा हमारा पहला तार्रुफ स्टूडेंट और टीचर का है। मैं धीरे धीरे बड़ा होता गया.. पर संदीप वैसे के वैसे... कब टीचर से दोस्त बन गए पता ही नहीं चला।

पिछली देर रात उनके घर जब रंगकर्मियों और उनके चाहने वालों के हुजूम में मैं भी पहुंचा तो डैडबॉडी देख हैरान था, क्योंकि वो अब भी यंग लग रहे थे। एकदम वैसे, जैसे 1994 में पहली मुलाकात में। खूबसूरत.. दिलकश.. मुस्कुराते हुए...


संदीप कम बोलते थे, पर अपने थिएटर स्टूडेंट्स को बोलने का पूरा मौका देते थे। तकरीबन पांच साल पहले उन्होंने चिल्ड्रन थिएटर वर्कशॉप के फिनाले के वक्त मुझे और मेरे जैसे कई एक्स जेकेके स्टूडेंट्स को केन्द्र बुलाया। रंगमंच की नई कोपलों से रूबरू कराने के लिए। उस प्रोग्राम को कंडेक्ट करने की जिम्मेदारी भी मेरी ही थी। आरजे विकास, आकांक्षा, गगन और मैं नई पीढ़ी से रूबरू हो रहे थे। संदीप यहां भी बस मुस्कुरा रहे थे।


एक अंदाजा लगाऊं तो 1994 में 2017 तक न न करते भी दस हजार से ज्यादा स्टूडेंट्स को थिएटर के गुर देने का श्रेय संदीप को जाता है। लोग बता रहे हैं कि संदीप कुछ तनाव में भी थे। पिछले कई सालों से हमारे ही रंगमंच के साथी जेकेके प्रशासन के पीछे कोर्ट कचहरी के चक्कर, नारेबाजी, यूनीयनबाजी में लीन रहे।

मुझे नहीं लगता वो तनाव रहा होगा, पर अपने स्थाईकरण को लेकर उन्होंने चार एक महीने पहले जेकेके प्रशासन पर केस जरूर किया था। तब से उन्हें सैलेरी न मिलने की बात भी सामने आ रही है। अगर ऐसा है तो बेहद अफसोसजनक है।

उनकी पत्नी बबीता भी बच्चों के साथ काम करती रही हैं। मैंने भी बचपन में 'शास्त्र देखो शास्त्र' नाटक में काम किया। बबीता जी, आपके दुख की भरपाई नहीं है.. पर यहां मैं यही कहूंगा, शास्त्र देखो, शास्त्र। हम मनुष्यों की यही नियती है। अपने चले जाते हैं, यादें छोड़ जाते हैं। हमें उनके लगाये पौधे को बचाए रखना है, बच्चों के रंगमंच को सींचते जाना है। मैं सरताज नारायण माथुर को भी याद कर चिंतित हो रहा हूं। जब से उनसे (माथुर सर) मिला हूं, संदीप को उनके बहुत नजदीक पाया। बिलकुल मानस पुत्र की तरह।

आज शिक्षक दिवस के मौके पर राजस्थान के रंगमंच को गहरी क्षति पहुंची है। कॉर्पोरेट होते जा रहे जवाहर कला केन्द्र के रंगायन की आत्मा आज संदीप के साथ पंचतत्व में विलीन हो रही है। ईश्वर उनके सभी स्टूडेंट्स और साथियों को संबल दे। इस आघात से उभरने की हिम्मत दे।

रंगमंच का एक स्टूडेंट।

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