
Jaipur: अगर आपका बच्चा रोजाना लंच बॉक्स का खाना बिना खाए घर ला रहा है, तो इसे हल्के में न लें। यह संकेत हो सकता है कि वह ’टिफिन शेमिंग’ का शिकार हो रहा है। यह एक ऐसी समस्या है जो राजधानी के कई स्कूलों में बच्चों को मानसिक दबाव और हीन भावना में धकेल रही है।
स्कूलों में टिफिन के लिए तय मैन्यू न होने से बच्चे तुलना और तानेबाजी का शिकार बन रहे हैं। ‘मेरे टिफिन में मोमोज और ड्राई-फ्रूट्स हैं, तेरे टिफिन में सिर्फ रोटी-सब्जी’ जैसे वाक्य बच्चों के आत्मविश्वास को चोट पहुंचा रहे हैं और पढ़ाई पर असर डाल रहे हैं।
जब कोई बच्चा घर का साधारण खाना जैसे दाल-चावल, रोटी-सब्जी या परांठा लेकर आता है और दूसरा बच्चा पिज्जा, बर्गर, पास्ता या ब्राउनी जैसे महंगे और दिखने में आकर्षक फूड लाता है, तब शुरू होती है टिफिन शेमिंग। ‘इतना बोरिंग खाना?’, ‘तुहारे घर में अच्छा खाना नहीं बनता?’ जैसी टिप्पणियां बच्चों को शर्मिंदा कर देती हैं और वे खुद को कमतर समझ कर मानसिक रूप से टूटने लगते हैं।
बच्चे अकेले बैठकर या छिपाकर लंच करने लगते हैं
स्कूल जाने से कतराने लगते हैं
आत्मविश्वास और सामाजिक जुड़ाव पर नकारात्मक असर
खाने को लेकर हीनभावना
कई स्कूलों में दो ब्रेक होते हैं। पहला ब्रेक सुबह साढ़े नौ बजे- इसमें कुछ बच्चे ड्राई-फ्रूट, सलाद, मूंग-मोठ या चना लाते हैं, तो कुछ कुछ भी नहीं लाते। दूसरे ब्रेक में जंक फूड का बोलबाला रहता है, जिसमें पिज्जा, बर्गर, नूडल्स लाने वाले बच्चे कई बार साधारण रोटी-सब्जी लाने वाले बच्चों को चिढ़ाते हैं।
Published on:
12 Aug 2025 11:04 am
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