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Jaisalmer: कम्प्यूटर की स्क्रीन ऑन है… लेकिन भविष्य लॉग-इन नहीं हो पा रहा

सरकारी स्कूलों में कम्प्यूटर, स्मार्ट बोर्ड और इंटरनेट तो मौजूद हैं, लेकिन पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं होने से डिजिटल शिक्षा की तस्वीर अधूरी बनी हुई है। जिले में कम्प्यूटर शिक्षा के 160 स्वीकृत पदों में 87 रिक्त होने से हर दूसरा तकनीकी शिक्षक गायब है, जिसका सीधा असर हजारों विद्यार्थियों की डिजिटल सीखने की क्षमता और भविष्य पर पड़ रहा है।
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जैसलमेर. एक कक्षा में कम्प्यूटर रखे हैं, स्मार्ट बोर्ड भी लगा है, इंटरनेट कनेक्शन भी मौजूद है... लेकिन घंटी बजने के बाद भी कम्प्यूटर की कक्षा शुरू नहीं होती, क्योंकि पढ़ाने वाला शिक्षक नहीं है। यह किसी एक स्कूल की कहानी नहीं, बल्कि सीमांत जिला जैसलमेर के सरकारी विद्यालयों की वास्तविक तस्वीर है। देश डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) और तकनीक आधारित रोजगार की ओर तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे समय जैसलमेर के सरकारी स्कूलों में कम्प्यूटर शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार—प्रशिक्षित शिक्षक—ही उपलब्ध नहीं है। शाला दर्पण के ताजा आंकड़े बताते हैं कि जिले में कम्प्यूटर शिक्षा और प्रयोगशाला सहायकों के 160 स्वीकृत पदों में 87 रिक्त हैं। यानी 54.4 प्रतिशत पद खाली हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो जिले में हर दूसरा तकनीकी शिक्षक गायब है। सबसे अधिक चिंता वरिष्ठ कम्प्यूटर शिक्षकों की कमी को लेकर है। इसका सीधा असर उच्च कक्षाओं में तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। शिक्षाविदों का मानना है कि डिजिटल शिक्षा का मूल्यांकन कम्प्यूटरों की संख्या से नहीं, बल्कि सीखने के परिणामों से होना चाहिए। यदि प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध नहीं होंगे तो स्मार्ट क्लास केवल उपकरण बनकर रह जाएंगी और डिजिटल शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रहेगा।

यह है स्थिति

-सीनियर कम्प्यूटर इंस्ट्रक्टर : 15 में 12 पद रिक्त (80%)

-बेसिक कम्प्यूटर इंस्ट्रक्टर : 94 में 57 पद रिक्त (61%)

-लैब असिस्टेंट : 47 में 16 पद रिक्त

- सीनियर लैब असिस्टेंट : 4 में 2 पद रिक्त

ब्लॉकवार तस्वीर

भणियाणा, मोहनगढ़, सम, फतेहगढ़, जैसलमेर, पोकरण और नाचना—लगभग हर ब्लॉक में बड़ी संख्या में पद खाली हैं। सीमावर्ती गांवों के विद्यार्थियों के पास निजी प्रशिक्षण संस्थानों का विकल्प भी नहीं है। ऐसे में सरकारी विद्यालय ही उनकी डिजिटल दुनिया का पहला दरवाजा हैं। जब यही दरवाजा अधूरा रह जाए, तो अवसर भी सीमित हो जाते हैं।

करोड़ों की मशीनें, लेकिन जरूरी 'मानव संसाधन' नहीं

सरकार ने स्कूलों तक कम्प्यूटर, स्मार्ट बोर्ड और डिजिटल संसाधन पहुंचा दिए, लेकिन सबसे अहम सवाल अब भी अनुत्तरित है—

-लैब नियमित कौन चलाएगा?

-प्रैक्टिकल कौन करवाएगा?

-डिजिटल कौशल कौन विकसित करेगा?

-एआइ और नई तकनीकों की बुनियाद कौन तैयार करेगा?

डिजिटल डिवाइड अब इंटरनेट का नहीं, शिक्षक का

कुछ वर्ष पहले डिजिटल डिवाइड का मतलब इंटरनेट और कम्प्यूटर की उपलब्धता माना जाता था। अब तस्वीर बदल चुकी है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगला डिजिटल अंतर प्रशिक्षित शिक्षक और गुणवत्तापूर्ण तकनीकी शिक्षा का होगा। निजी विद्यालय लगातार डिजिटल दक्षता बढ़ा रहे हैं, जबकि सरकारी विद्यालय शिक्षक रिक्तियों से जूझ रहे हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो दोनों के बीच सीखने का अंतर और चौड़ा होगा।

सबसे बड़ा असर रोजगार पर

मौजूदा समय में बैंकिंग, रेलवे, रक्षा, एसएससी, राजस्थान की भर्ती परीक्षाएं, कॉलेज प्रवेश, ऑनलाइन आवेदन और निजी क्षेत्र—हर जगह कम्प्यूटर दक्षता अनिवार्य है।

विद्यालय स्तर पर मजबूत आधार नहीं बनने का मतलब है कि सरकारी विद्यालयों का विद्यार्थी प्रतियोगिता में पहले कदम से ही पीछे खड़ा होगा।

भर्ती प्रक्रिया से होगी नियुक्ति

कम्प्यूटर शिक्षक और प्रयोगशाला सहायकों के रिक्त पदों पर नियुक्तियां राज्य स्तर की भर्ती प्रक्रिया के बाद ही संभव होंगी।

- महेश कुमार बिस्सा, जिला शिक्षा अधिकारी, जैसलमेर