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इतिहास अलमारियों में कैद, डिजिटल दौर में विरासत की सुरक्षा पर सवाल

डिजिटल युग में जहां सूचनाएं तेजी से ऑनलाइन स्वरूप में सुरक्षित की जा रही हैं, वहीं जैसलमेर सहित देश के कई ऐतिहासिक जिलों की अमूल्य विरासत अब भी कागजी अभिलेखों में सिमटी हुई है। रियासतकालीन दस्तावेज, भू-अभिलेख और प्रशासनिक रिकॉर्ड इतिहास की महत्वपूर्ण धरोहर हैं, लेकिन उनके संरक्षण और डिजिटाइजेशन की धीमी गति भविष्य के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

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जैसलमेर. डिजिटल युग में दुनिया का बड़ा हिस्सा क्लाउड और सर्वर पर सिमट रहा है, लेकिन भारत के कई ऐतिहासिक जिलों की अमूल्य विरासत अब भी कागजों के पन्नों में कैद है। स्वर्णनगरी जैसलमेर भी उन्हीं शहरों में शामिल है, जहां रियासतकालीन अभिलेख, पुराने पट्टे, भू-अभिलेख, प्रशासनिक रिकॉर्ड और ऐतिहासिक दस्तावेज इतिहास की महत्वपूर्ण परतों को संजोए हुए हैं।

सवाल यह है कि क्या ये धरोहरें आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच पाएंगी? अंतरराष्ट्रीय अभिलेखागार दिवस केवल दस्तावेजों का उत्सव नहीं, बल्कि रिकॉर्ड संरक्षण की वास्तविक स्थिति को परखने का अवसर भी है। राजस्थान देश के उन राज्यों में शामिल है जहां हजारों ऐतिहासिक दस्तावेज सरकारी अभिलेखागारों में संरक्षित हैं। बावजूद इसके, डिजिटाइजेशन की गति और स्थानीय स्तर पर संरक्षण व्यवस्था को लेकर कई चुनौतियां मौजूद हैं।

जैसलमेर क्यों महत्वपूर्ण?

जैसलमेर केवल पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि पश्चिमी भारत के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत भी है। यहां उपलब्ध पुराने भू-अभिलेख, जागीर रिकॉर्ड, राजस्व दस्तावेज और प्रशासनिक फाइलें शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और नीति विशेषज्ञों के लिए बहुमूल्य सामग्री हैं।

हकीकत यह भी

- पुराने दस्तावेज अब भी भौतिक स्वरूप में पूरी तरह से सुरक्षित नहीं

- सभी रिकॉर्ड डिजिटल स्वरूप में अब तक परिवर्तित नहीं

-कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों का बैकअप उपलब्ध नहीं

- रिकॉर्ड संरक्षण के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद नहीं

डेटा से समझिए चुनौती

भारत में राष्ट्रीय अभिलेखागार और राज्य अभिलेखागारों में करोड़ों पृष्ठों का रिकॉर्ड सुरक्षित है। विशेषज्ञ मानते हैं कि डिजिटाइजेशन केवल संरक्षण नहीं, बल्कि सार्वजनिक पहुंच और शोध को भी आसान बनाता है। जैसलमेर जैसे जिलों में रिकॉर्ड का महत्व और बढ़ जाता है क्योंकि यहां भूमि, सीमावर्ती प्रशासन, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक पहचान से जुड़े अनेक दस्तावेज मौजूद हैं।

असली सवाल

जब दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल डेटा की ओर बढ़ रही है, तब क्या जैसलमेर की ऐतिहासिक स्मृतियां अब भी फाइलों और अलमारियों तक सीमित रहेंगी? या फिर उन्हें डिजिटल स्वरूप में संरक्षित कर वैश्विक शोध और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाएगा? अंतरराष्ट्रीय अभिलेखागार दिवस पर यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि इतिहास केवल अतीत का रिकॉर्ड नहीं, भविष्य की समझ का भी आधार होता है।

एक्सपर्ट व्यू: दस्तावेजों की हाई-रिजोल्यूशन स्कैनिंग, डिजिटल बैकअप की बहुस्तरीय व्यवस्था जरूरी

अभिलेख संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दशक में डिजिटल आर्काइविंग सबसे बड़ा फोकस क्षेत्र होगा।

इसके लिए जरूरी है दुर्लभ दस्तावेजों की हाई-रिजोल्यूशन स्कैनिंग, डिजिटल बैकअप की बहुस्तरीय व्यवस्था। इसके अलावा सार्वजनिक शोध पोर्टल का विकास भी होना चाहिए। जिला स्तर पर अभिलेख संरक्षण प्रयोगशालाएं व रिकॉर्ड प्रबंधन में आधुनिक तकनीक का उपयोग भी लाभकारी हो सकेगा।

-जेपी व्यास, चार्टेड अकाउंटेंट और कला व संस्कृति विशेषज्ञ