
जिले के सबसे पुराने स्टेशन के है यह हाल,यात्रियों को हो रही परेशानी,जानिए पूरी खबर
पोकरण . जिले के सबसे पुराने पोकरण रेलवे स्टेशन पर आज भी छाया-पानी जैसी सुविधाओं का अभाव है। बावजूद इसके रेलवे विभाग की ओर से यहां जनसुविधाओं व स्टेशन विकास को लेकर नजरें इनायत नहीं की जा रही है। इससे यहां से सफर करने वाले यात्रियों को परेशानी हो रही है। स्थानीय रेलवे स्टेशन से प्रतिदिन आधा दर्जन रेलों का आवागमन होता है। जिसमें सैंकड़ों यात्री सफर करते है। बाबा रामदेव के गुरु बालीनाथ महाराज का आश्रम पोकरण में स्थित होने तथा यहां से पांच किमी दूर उत्तर दिशा में भैरव राक्षस की गुफा व बाबा रामदेव के इतिहास से जुड़े कई स्थल, जिसमें पोकरण फोर्ट, बाबा की कोटड़ी, रामदेवसर तालाब आदि कई स्थल यहां स्थित है। इसके अलावा पोकरण फिल्ड फायरिंग, सीमा सुरक्षा बल मुख्यालय, आर्मी हेडक्वार्टर होने के कारण यहां से प्रतिदिन बड़ी संख्या में सैनिक भी सफर करते है, लेकिन रेलवे स्टेशन पर छाया, पानी आदि की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण इन यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
विश्राम के लिए पेड़ों की छांव
स्थानीय रेलवे स्टेशन पर पर्याप्त छाया की व्यवस्था नहीं है। हालांकि कुछ वर्ष पूर्व रेलवे विभाग की ओर से यहां 30-35 मीटर लम्बे एक शेड का निर्माण करवाया गया था। यह शेड आम दिनों में यात्रियों के लिए पर्याप्त साबित होता है, लेकिन बाबा रामदेव के अंतरप्रांतीय ***** मेले के दौरान यहां प्रतिदिन आने वाले हजारों यात्रियों, सर्दी के मौसम में सेना के जवानों के आवागमन अथवा कई बार भीड़ बढ जाने के दौरान अपर्याप्त साबित होता है। छाया के लिए निर्मित इस शेड में पंखों की व्यवस्था नहीं होने के कारण स्टेशन पर आने वाले यात्रियों को यहां स्थित पेड़ों की ठण्डी छांव में बैठकर विश्राम करना पड़ता है। इसी प्रकार रेलवे स्टेशन परिसर पर कुर्सियों व बैंचों की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। जिसके चलते यात्रियों को जमीन पर ही बैठना व सोना पड़ता है। इसके अलावा पानी के लिए भी पूर्व में लगाई गई करीब आधा दर्जन सार्वजनिक टोटियां अधिक समय बंद रहती है। इनमें गर्म पानी की आपूर्ति होती है, जो पीने लायक नहीं होता है। रेलवे स्टेशन पर प्याऊ का भी अभाव है।
क्षतिग्रस्त है भवन
स्थानीय रेलवे स्टेशन की स्थापना 1938 में की गई थी। उस समय मारवाड़ स्टेट की रेल मात्र पोकरण तक आती थी तथा उत्तर पश्चिम रेलवे का यह अंतिम स्टेशन हुआ करता था। उस समय कोयले व पानी के इंजिन चलते थे तथा रेल को संचालन करने के लिए यहां लोकोशेड, पानी की पर्याप्त व्यवस्था की गई थी। यहां सैंकड़ों की संख्या में कार्यरत कार्मिकों के लिए विभाग की ओर से आवासों का भी निर्माण करवाया गया था। अंतिम स्टेशन होने के कारण यहां रनिंग रूम, रेलवे अस्पताल व विश्राम गृह की भी पर्याप्त व्यवस्था की गई थी, लेकिन धीरे धीरे समय के बदलाव के साथ डीजल के इंजिन आ जाने के कारण लोकोशेड बंद कर दिया गया। फलस्वरूप धीरे धीरे कर्मचारियों की कमी हो जाने के कारण अस्पताल, विश्राम गृह, रनिंग रूम आदि भी बंद हो गए। ऐसे में रेलवे की ओर से निर्माण करवाए गए दर्जनों आवास भी अब बेकार पड़े है।
Published on:
28 Nov 2018 09:04 am
