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जैसलमेर. दोस्ती कभी एक ही स्कूल, एक ही मोहल्ले, पड़ोस के खेल मैदान या वर्षों के साथ से जन्म लेती थी। अब यह तस्वीर बदल चुकी है। आज किसी पुस्तक पर हुई चर्चा, प्रतियोगी परीक्षा का अध्ययन समूह, साझा रुचियों वाला सामाजिक मंच, डिजिटल खेल या कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित संवाद भी गहरी मित्रता की शुरुआत बन रहे हैं। नई पीढ़ी की दोस्ती अब दूरी नहीं, बल्कि संवाद, समान सोच और साझा अनुभवों पर टिक रही है। यही बदलाव भारत के सामाजिक ताने-बाने को नई दिशा दे रहा है। देश में इंटरनेट और स्मार्टफोन का विस्तार केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी बड़ा कारण बना है। अब रिश्ते भौगोलिक सीमाओं में कैद नहीं हैं। जैसलमेर का युवा केरल, असम, कश्मीर या विदेश में रहने वाले किसी व्यक्ति के साथ प्रतिदिन संवाद कर सकता है। कई रिश्ते ऐसे हैं, जो कभी आमने-सामने मिले बिना भी वर्षों से मजबूत बने हुए हैं।
-देश में करीब 95 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं।
- करीब 80 करोड़ से ज्यादा स्मार्टफोन सक्रिय हैं।
- युवा वर्ग प्रतिदिन औसतन तीन से पांच घंटे सामाजिक माध्यमों पर बिताता है।
-देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, जो डिजिटल संवाद को सबसे तेजी से अपना रही है।
-अध्ययन बताते हैं कि बड़ी संख्या में युवा अपने नए मित्र सामाजिक माध्यमों, अध्ययन समूहों और रुचि आधारित समुदायों के माध्यम से बना रहे हैं।
पहले दोस्त संयोग से मिलते थे, अब तकनीक भी उन्हें जोड़ रही है। मोबाइल पर दिखाई देने वाले सुझाव, समान रुचियों वाले समूह, साझा गतिविधियां और गणनात्मक प्रणालियां लोगों को एक-दूसरे से जोड़ रही हैं। यदि कोई व्यक्ति यात्रा, साहित्य, प्रतियोगी परीक्षाओं, कृषि, संगीत या उद्यमिता जैसे विषयों में रुचि रखता है, तो उसी रुचि वाले लोगों से उसका संपर्क तेजी से बन जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित संवाद सेवाओं का उपयोग तेजी से बढ़ा है। बड़ी संख्या में युवा पढ़ाई, कॅरियर, लेखन, मानसिक तनाव और सामान्य बातचीत के लिए इनका उपयोग कर रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता जानकारी और संवाद का अच्छा माध्यम हो सकती है, लेकिन भावनात्मक रिश्तों का विकल्प नहीं। कठिन समय में परिवार, मित्र और समाज की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण बनी रहेगी।
डिजिटल दोस्ती अब केवल महानगरों की कहानी नहीं रही। जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, कोटा, अजमेर और देश के सैकड़ों छोटे शहरों के युवा अब राष्ट्रीय स्तर के अध्ययन समूहों, नवाचार मंचों, कला समुदायों और सामाजिक अभियानों से जुड़ रहे हैं। इससे अवसर भी बढ़े हैं और आत्मविश्वास भी।
मेरे कई अच्छे दोस्त ऐसे हैं, जिनसे आज तक मुलाकात नहीं हुई। पढ़ाई के दौरान बने ये रिश्ते आज सबसे मजबूत सहारा हैं।
-आरव शर्मा, अभ्यर्थी, प्रतियोगी परीक्षा
सामाजिक माध्यमों ने अलग-अलग राज्यों के लोगों से जोड़ा। कई बार किसी विषय पर सबसे पहले दोस्तों से चर्चा होती है।
-साक्षी चौधरी, स्नातक छात्रा
बदलाव के प्रमुख संकेत
-परिचितों की संख्या बढ़ी
-प्रत्यक्ष मुलाकातें कम हुईं
-मोबाइल पर निर्भरता बढ़ी
-झूठी पहचान का खतरा बढ़ा
-सामाजिक तुलना से बढ़ रहा मानसिक दबाव
- परिवार के साथ बिताया जाने वाला समय घटा
-दूर रहने वाले मित्रों से निरंतर संपर्क
-समान रुचियों वाले लोगों तक आसान पहुंच
-पढ़ाई और रोजगार में सहयोग
-नए विचारों और संस्कृतियों से परिचय
-कठिन समय में त्वरित संवाद की सुविधा
डिजिटल माध्यमों ने सामाजिक रिश्तों की पारंपरिक सीमाएं तोड़ी हैं। अब समान रुचियां और साझा उद्देश्य दोस्ती का नया आधार बन रहे हैं। आने वाले वर्षों में यह बदलाव और गहरा होगा।
-डॉ. नीलिमा वर्मा, समाजशास्त्री
डिजिटल संवाद उपयोगी है, लेकिन वास्तविक जीवन के रिश्तों की जगह नहीं ले सकता। मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्यक्ष संवाद और सामाजिक जुड़ाव उतना ही आवश्यक है।
-डॉ. राघव मेहता, मनोवैज्ञानिक
व्यक्तिगत तथा तकनीक-आधारित होंगे भविष्य के रिश्ते
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और गणनात्मक प्रणालियां लोगों को समान रुचियों के आधार पर जोड़ रही हैं। भविष्य में सामाजिक रिश्तों का स्वरूप और अधिक व्यक्तिगत तथा तकनीक-आधारित होगा।
- आदित्य सक्सेना, डिजिटल व्यवहार विशेषज्ञ
Updated on:
01 Aug 2026 08:31 pm
Published on:
01 Aug 2026 08:31 pm
