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Maharana Pratap: वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप के शौर्य को ननिहाल जालोर में भूले, विद्यालय का नाम बदला

महाराणा प्रताप की माता रानी जयवंता (जयवंती) जालोर के सोनगरा चौहान वंश से थीं। जालोर के चौहान उस समय मेवाड़ के विश्वसनीय सहयोगी थे।

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Maharana Pratap Jayanti 2026

महाराणा प्रताप (फाइल फोटो-पत्रिका)

महाराणा प्रताप जयंती विशेष: राजस्थान के जालोर शहर के महाराणा प्रताप चौक स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय का निर्माण 1959 में हुआ था। उस समय विद्यालय का नाम वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के नाम पर रखा गया था। यह केवल एक नाम नहीं, बल्कि शौर्य, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा का प्रतीक था।

समय के साथ विद्यालय की पहचान धीरे-धीरे गल्र्स स्कूल तक सीमित होकर रह गई और मूल नाम आमजन की स्मृति से ओझल होता चला गया। आज जबकि पूरे देश में महाराणा प्रताप जयंती मनाई जा रही है, ऐसे में यह उचित अवसर है कि विद्यालय को पुन: उसके मूल गौरवशाली नाम महाराणा प्रताप राजकीय विद्यालय से पहचान दिलाई जाए।

मारवाड़ और मेवाड़ के ऐतिहासिक संबंध सदियों पुराने रहे हैं। वीरता, संस्कृति और स्वाभिमान की इस साझा विरासत को संजोने का कार्य ऐसे नामों के संरक्षण से ही संभव है। विद्यालय का नाम केवल पहचान नहीं होता, वह आने वाली पीढिय़ों के लिए प्रेरणा और इतिहास से जुड़ाव का माध्यम भी बनता है। ऐसे में जनभावना यही है कि महाराणा प्रताप चौक स्थित इस विद्यालय को पुन: महाराणा प्रताप के नाम से स्थापित कर इतिहास और गौरव को सम्मान दिया जाए।

जालोर प्रताप का ननिहाल था

महाराणा प्रताप की माता रानी जयवंता (जयवंती) जालोर के सोनगरा चौहान वंश से थीं। जालोर के चौहान उस समय मेवाड़ के विश्वसनीय सहयोगी थे। हल्दीघाटी के युद्ध (1576 ई.) के दौरान और उसके बाद जब महाराणा प्रताप अरावली के जंगलों से मुगलों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे, तब जालोर के तत्कालीन शासक ने उन्हें सहयोग दिया था।

अधीनता नहीं स्वीकारी, अकबर से लोहा लिया

महाराणा प्रतापत का जन्म 9 मई 1540 (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया) को कुंंभलगढ़ दुर्ग में हुआ। उन्हें भील समुदाय के लोग प्यार से 'कीका' कहकर बुलाते थे। इनका राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 को गोगुंदा में हुआ। 18 जून 1576 को ऐतिहासिक हल्दीघाटी का युद्ध हुआ। युद्ध के दौरान उनके घोड़े 'चेतक' ने अदम्य साहस दिखाया और घायल होने के बावजूद प्रताप को सुरक्षित स्थान पर ले जाकर प्राण त्याग दिए।

हल्दीघाटी युद्ध के बाद प्रताप ने हार नहीं मानी और अरावली की पहाडिय़ों में रहकर छापामार युद्ध जारी रखा। 1582 में महाराणा प्रताप ने दिवेर नामक चौकी पर विजय प्राप्त की। 1584 के बाद प्रताप ने मेवाड़ के कुंभलगढ़, उदयपुर और गोगुंदा को मुगलों से वापस छीन लिया। महाराणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता कभी स्वीकार नहीं की और अपना संपूर्ण जीवन मातृभूमि की रक्षा में समर्पित कर दिया, जिसके लिए उन्हें 'मेवाड़ का शेर' कहा जाता है।

शौर्य को पहचान जरूरी

महाराणा प्रताप शौर्य के प्रतीक है। राजधर्म की रक्षा के लिए प्रताप ने ताउम्र मुगल आक्रांताओं से न केवल युद्ध लड़े, बल्कि मेवाड़ा को मुगलों से मुक्त भी करवाया। मेवाड़ और मारवाड़ का सीधा संबंध रहा है। महाराणा प्रताप के कृतित्व को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

  • कृष्णपालसिंह राखी, युवा

महाराणा प्रताप की माता जयवंता (जयवंती) जालोर में सोनगरा अखेराज की पुत्री थी। इस लिहाज से महाराणा प्रताप जालोर के भाणेज है। इनके लिए जालोर भी शौर्य स्मारक की स्थापना होनी चाहिए। जयंती पर कार्यक्रम भी आयोजित होने चाहिए।

  • अचलेश्वर आनंद, साहित्यकार

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