5 फ़रवरी 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

2 रुपए साइकिल का किराया, 1 बीड़ी का बंडल-माचिस लेकर कार्यकर्ता करते थे चुनाव प्रचार

-अब चुनाव होने लगे बेहद खर्चीले, धनबल का उपयोग अधिक -40 लाख रुपए चुनाव आयोग ने तय कर रखी है खर्च सीमा -4 गुना अधिक रकम अघोषित रूप से खर्च की जाती है प्रचार में

2 min read
Google source verification
5_2.jpg

mp election 2023

सचिन बैरागी

झाबुआ। विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रत्याशी लाखों रुपए पानी की तरह बहा देते हैं। खुद चुनाव आयोग ने ही प्रत्येक प्रत्याशी के लिए 40 लाख रुपए खर्च सीमा निर्धारित कर रखी है, जबकि अघोषित रूप से इससे चार गुना रकम प्रचार में लगाई जाती है। शुरुआती दौर के चुनावों में ऐसा नहीं होता था। महज 2 रुपए साइकिल का किराया, एक बीड़ी का बंडल और एक माचिस लेकर ही कार्यकर्ता प्रचार के लिए गांव-गांव रवाना हो जाते थे।

ऐसी ही चुनाव की यादों को पत्रिका के साथ साझा किया कांग्रेस से चार बार की विधायक रही गंगाबाई बारिया ने। घर से खाकर निकलते थे, दिन में होता था प्रचार पूर्व विधायक गंगाबाई बारिया ने बताया प्रचार के लिए घर से ही कुछ खा पीकर निकलते थे, क्योंकि उस समय कहीं होटल या ढाबे तो हुआ नहीं करते थे। गांव में अलग अलग फलिए में जाकर लोगों से बात करते थे। पूरा प्रचार कार्य दिन के उजाले में ही करना पड़ता था, क्योंकि उस वक्त गांवों में लाइट नहीं हुआ करती थी।

जोबट विस से पहला चुनाव लड़कर जीता

93 साल की गंगाबाई बारिया। आज भी पूरी तरह फीट है। वर्ष 1957 में अविभाजित झाबुआ जिले की जोबट विधानसभा से पहला चुनाव लडकऱ जीत हासिल की थी। इसके बाद एक बार झाबुआ तो दो बार पेटलावद विधानसभा से विधायक चुनी गई। उन्होंने बताया कि पहले कार्यकर्ता को साइकिल के किराये के रूप में 2 रुपए और एक बीड़ी का बंडल व माचिस दे दिया करते थे। वह पूरे दिन गांवों में घूम-घूमकर प्रचार करता रहता। पार्टी प्रत्याशियों को जीप मुहैया कराती थी।

इसमें डीजल खुद डलाना पड़ता था। दूसरे चुनाव में एक कार्यकर्ता का खर्च 2 रुपए से बढ़का 5 रुपए हो गया। गांवों में तड़वी-पटेल अहम भूमिका निभाते थे। 1980 में पार्टी ने चुनाव लडऩे के लिए पेटलावद भेज दिया। इस चुनाव से पार्टी कार्यालय से प्रत्याशी को गाड़ी मिलना बंद हो गई। खुद ही जीप किराये पर लेना पड़ी। हालांकि अब चुनाव प्रचार पर होने वाले लाखों रुपए को लेकर वे आश्चर्य करती है और कहती हैं कि प्रत्याशी इतनी रकम लाता कहां से हैं?

नामावली में 25 साल उम्र लिखी थी तो मिला टिकट

गंगाबाई बताती हैं कि कांग्रेस की महिला कार्यकर्ताओं ने एक महिला मंडल बना रखा था। उसकी संयोजक बसंतीबेन थी। पार्टी नेता किसी महिला को टिकट देना चाहते थे। जब नामावली देखी तो गंगाबाईकी उम्र 25 साल निकली। ऐसे में बसंतीबेन ने कहा गंगा को टिकट दे दो। बस उनका नाम फाइनल कर उन्हें जोबट विधानसभा से चुनाव लडऩे भेज दिया।

कब-कब विधायक रही गंगाबाई बारिया

-1957 में पहली बार अविभाजित झाबुआ जिले की जोबट विधानसभा से विधायक चुनी गई। उस वक्त उन्हें 6248 मत मिले। जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी भीमा को 4447 मत प्राप्त हुए। जीत का अंतर 1801 मतों का रहा।

- 1972 में दूसरी बार झाबुआ विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुई। इस चुनाव में गंगाबाई को 8992 मत मिले जबकि प्रतिद्वंद्वी प्रेमसिंह को 6721 मत प्राप्त हुए। जीत का अंतर 2271 मतों का रहा।

-1980 से 1990 तक लगातार 10 सालों तक पेटलावद विधानसभा से विधायक रहीं।

1980 में गंगाबाई ने देवेंद्रसिंह को 12395 मतों से हराया। गंगाबाई को 18095 मत मिले तो देवेंद्रसिंह को महज 5700 मत प्राप्त हुए। वहीं 1985 के चुनाव में गंगाबाई अपने प्रतिद्वंद्वी बाबूलाल से महज 468 मतों के अंतर से जीत प्राप्त कर सकी। गंगाबाई को 13325 मत मिले तो बाबूलाल को 12857 मत प्राप्त हुए। - गंगाबाई झाबुआ नगर पालिका की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।