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एमपी में उगने लगा अब काजू, बहुत फायदेमंद है इसकी खेती

प्रदेश में कुछ समय में खेती में कई तरह के नए बदलाव आए हैं। किसान अब परंपरागत खेती के साथ-साथ अलग और मुनाफा प्रदान करने वाली फसलों की तरफ रुख करने लगे हैं।

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एमपी में उगने लगा अब काजू, बहुत फायदेमंद है इसकी खेती,एमपी में उगने लगा अब काजू, बहुत फायदेमंद है इसकी खेती

पेटलावद. प्रदेश में कुछ समय में खेती में कई तरह के नए बदलाव आए हैं। किसान अब परंपरागत खेती के साथ-साथ अलग और मुनाफा प्रदान करने वाली फसलों की तरफ रुख करने लगे हैं। सरकार भी अपने स्तर पर किसानों को जागरूक कर रही है और किसान भी नित नई तकनीक से जैविक खेती की ओर भी अग्रसर हो रहे हैं। काजू की बड़े पैमाने पर खेती केरल, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा एवं पश्चिम बंगाल में की जाती है, लेकिन इस मामले में मप्र के झाबुआ जिले का पेटलावद भी कम नहीं है। यहां के ग्राम बावड़ी के किसान जितेंद्र पाटीदार ने अपने खेत पर काजू की खेती करकर सिद्ध कर दिया कि अगर किसी भी काम में दृढ़ निश्चय कर लिया तो वह काम कितना ही कठिन क्यों न हो आपको सफलता जरूर मिलती है।

कच्चा काजू पैदा करने में भारत दूसरे स्थान पर है। जबकि पहले पर आइवरी कोस्ट का नाम है। काजू के प्रोसेसिंग में भारत का स्थान पहला है। देश के पश्चिमी और पूर्वी तटीय इलाकों में इसकी पैदावार सबसे ज्यादा होती है। जमीनी क्षेत्र की बात करें तो महाराष्ट्र में बड़ी मात्रा में उत्पादन किया जाता है, लेकिन अब एमपी में भी कई किसान इसकी खेती करकर दुगना मुनाफा कमा रहे हैं।

बता दें कि झाबुआ जिले का पेटलावद क्षेत्र कृषि प्रधान क्षेत्र होकर इस क्षेत्र के रहवासियों का मुख्य व्यवसाय कृषि है और आबादी की लगभग 70 प्रतिशत की जनसंख्या खेती तथा मजदूरी करती है। आजादी के बाद इस क्षेत्र के किसानों द्वारा परंपरागत कृषि करते हुए मक्का, कपास की फसल बोई जाती थी, किंतु पिछले 30 वर्षों में किसानों के द्वारा तरक्की करते हुए गेहूं, चना, तिलहन, दाल, सब्जियां व टमाटर और हरी मिर्ची की खेती की जाने लगी है। पेटलावद क्षेत्र का टमाटर और शिमला मिर्च भारत सहित अन्य देशों तक निर्यात हुआ है। इससे यहां के किसानों का नाम अन्य देशों में भी ऊंचा हुआ। अब इस क्षेत्र का किसान उन्नातीशील व व्यावसायिक खेती की ओर बढ़ रहा है। इसका सीधा प्रमाण यह है कि इस क्षेत्र के किसान अन्य राज्यो में उत्पादित होने वाली काजू की फसल बोकर उनसे मुनाफा कमाने की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

फायंदेमंद है काजू की खेती

काजू काफी फायदेमंद फसल है। इसे काली भारी मिट्टी और ऐसी मिट्टी जहां जल का भराव होता है, को छोड़कर सभी तरह की मिट्टी में लगाया जा सकता है। वैसे तो रोपण के दूसरे साल से उत्पादन प्राप्त होता है, मगर व्यावसायिक उत्पादन में छह-सात साल लग जाते हैं। प्रति पेड़ औसतन 15-20 किलोग्राम उत्पादन होता है। बता दें कि भारत में काजू सबसे ज्यादा केरल में पैदा होता है। केरल के बाद कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर काजू की खेती होती है।

गोवा वैरायटी के 5 पौधे लगाए

बावड़ी के उन्नत किसान के नाम से पहचाने जाने वाले जितेंद्र पाटीदार जो कभी स्ट्राबेरी की खेती तो कभी शिमला मिर्च तो कभी अन्य फसल को लेकर चर्चा में बने रहते है। इस बार उन्होंने अपने खेत में 5 काजू के पौधे भी लगाए। इसमें उन्होंने काजू की गोवा वेरायटी लगाई। वे बताते है कि इसकी देखभाल उनकी भाभी अर्चना पाटीदार और पत्नी अनुराधा पाटीदार दोनों ने मिलकर की ओर पौधों को बड़ा किया। इन पौधों को उन्होंने 4 वर्ष पहले लगाया था, जब एक पौधे की कीमत 350 रुपए के करीब थी, जो अब 800 रुपए के करीब जा पहुंची है। अब आने वाले दिनों में एक पौधे से करीब 10 से 15 किलो काजू का उत्पादन होने का अनुमान वे लगा रहे हैं।

मुनाफेवाली होती है काजू की खेती

बेहतरीन ड्राई फ्रूट्स में गिने जाने वाला काजू सेहत के लिए काफी फायदेमंद होता है। इसमें जिंक, आयरन, मैंगनीज, मैग्नीशियम, पोटैशियम, कॉपर और सेलेनियम जैसे खनिज तत्व पाए जाते हैं। लेकिन इसकी खेती और प्रोसेसिंग काफी कठिन होती है। देश तथा विदेश में इसकी भारी मांग है। इसलिए इसकी खेती किसानों को लाखों की आमदनी दिला सकती है।

झाबुआ जिले की मिट्टी के लिए अनुकूल है वैरायटी

उद्यानिकी प्रभारी सुरेश इनवाती ने बताया जिस वैरायटी का काजू कृषक जितेंद्र ने लगाया है, वह वेरायटी हमारे झाबुआ जिले की मिट्टी के लिए अनुकूल साबित हुई है। यानि गोवा वैरायटी का काजू हमारे क्षेत्र में उत्पादित किया जा सकता है। किसानों को चाहिए कि उस वैरायटी के काजू के पौधे लगाकर उसकी खेती करें। अगर पौधों में समय समय पर खाद आदि की मात्रा पर्याप्त रही तो उत्पादन अच्छा होगा। पेटलावद क्षेत्र के किसानों का अगर रुझान इस खेती की ओर बड़ा तो इसे सरकार की योजना में शामिल करने के प्रयास हमारे द्वारा किए जाएंगे।

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जैविक खाद का होता है प्रयोग
काजू की खेती में उन्होंने केवल जैविक खाद यानी देशी खाद का इस्तेमाल किया है। किसी भी प्रकार से रासायनिक खाद का उपयोग उन्होंने काजू के पौधों को बड़ा करने में नहीं किया। यही वजह है कि अब उनमें काजू लगना शुरू हो गई है। जितेंद्र ने बताया कि किसान अगर जैविक खाद का उपयोग सही ढंग से करें तो उन्हे रासायनिक खाद की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।