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Jhalawar: इस औषधीय खेती ने बदली किसानों की किस्मत, कम लागत में होता है ज्यादा मुनाफा

Agriculture News: झालावाड़ जिले में औषधीय खेती किसानों के लिए आय का नया साधन बनकर उभर रही है। कम लागत, कम पानी और बढ़ती बाजार मांग के कारण अश्वगंधा की खेती किसानों की किस्मत बदल रही है।

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Asvgandha

प्रतीकात्मक तस्वीर: पत्रिका

Ashwagandha Farming Business: खेती में अब केवल परंपरागत फसलों पर निर्भर रहना किसानों के लिए उतना लाभकारी नहीं रह गया है। बदलते समय और बाजार की मांग को देखते हुए किसान औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख फसल है अश्वगंधा

अश्वगंधा एक ऐसा औषधीय पौधा है जिसकी खेती कम लागत, कम पानी और अधिक मांग के कारण किसानों के लिए कमाई का मजबूत जरिया बनती जा रही है। आयुर्वेद से लेकर आधुनिक हर्बल इंडस्ट्री तक अश्वगंधा की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे इसकी खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रही है।

क्यों है अश्वगंधा खास

तहसील के गांव ढाबली खुर्द निवासी किसान कमलेश कुमार नागर, रमेशचंद धाकड़ तथा प्रत्थाखेड़ी देवनगर निवासी लालचंद नागर बताते हैं कि अश्वगंधा एक प्रमुख औषधीय पौधा है। आयुर्वेद में इसे ताकत बढ़ाने, तनाव कम करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने वाली औषधि माना जाता है।

अश्वगंधा की जड़, पत्तियां और बीज औषधि निर्माण में उपयोग किए जाते हैं। आयुर्वेदिक दवाओं, चूर्ण, कैप्सूल और हर्बल सप्लीमेंट्स में इसकी व्यापक मांग है। देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी आयुर्वेदिक और हर्बल उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता के कारण अश्वगंधा की अंतरराष्ट्रीय मांग तेजी से बढ़ रही है। फार्मा कंपनियां और आयुर्वेदिक दवा निर्माता इसकी नियमित खरीद करते हैं। वहीं, कई राज्य सरकारें औषधीय खेती को बढ़ावा देने के लिए अनुदान और प्रशिक्षण भी उपलब्ध करा रही हैं।

किन क्षेत्रों में होती है खेती

जिले में झालरापाटन तहसील के गांव बावड़ीखेड़ा, रुंडलाव, देवनगर प्रत्थाखेड़ी, ढाबली खुर्द, गड़ारी, नलखाड़ी, तीतरी, तीतरवासा, झूमकी, नयागांव सहित आसपास के गांवों में अश्वगंधा की खेती प्रमुखता से की जा रही है।

अश्वगंधा की खेती शुष्क एवं अर्ध-शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। यह फसल उन इलाकों में आसानी से उगाई जा सकती है, जहां पानी की उपलब्धता सीमित होती है। हल्की दोमट या रेतीली मिट्टी, जिसमें जल निकासी अच्छी हो, अश्वगंधा की खेती के लिए बेहतर रहती है।

इसकी बुवाई जून-जुलाई में खरीफ सीजन के दौरान की जाती है। किसान चाहे तो बीज पहले नर्सरी में तैयार कर खेत में रोपाई कर सकते हैं या सीधे खेत में भी बो सकते हैं। प्रति एकड़ जमीन में लगभग 4 से 5 किलो बीज पर्याप्त माना जाता है।

कम देखभाल वाली फसल

अश्वगंधा की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें अधिक खाद, पानी और देखभाल की आवश्यकता नहीं होती। गोबर की खाद या जैविक खाद से अच्छी पैदावार मिल जाती है। पूरी फसल अवधि में केवल दो से तीन बार हल्की सिंचाई पर्याप्त होती है।

कीट और रोगों का प्रकोप भी बहुत कम रहता है, जिससे कीटनाशकों पर खर्च ना के बराबर होता है। अश्वगंधा की फसल लगभग 150 से 180 दिनों में तैयार हो जाती है। जनवरी-फरवरी के दौरान पौधों की खुदाई की जाती है। सबसे अधिक औषधीय महत्व इसकी जड़ों का होता है, जिन्हें खुदाई के बाद अच्छी तरह धोकर सुखाया जाता है और फिर बाजार में बेचा जाता है।

कम पानी, कम जोखिम और बढ़ती मांग के कारण अश्वगंधा की खेती किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभर रही है। खेती शुरू करने से पहले नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या औषधीय पौध बोर्ड से तकनीकी जानकारी लेना फायदेमंद रहता है। सही तकनीक, अच्छी गुणवत्ता के बीज और उचित बाजार संपर्क के साथ किसान अश्वगंधा की खेती कर अच्छी आमदनी हासिल कर सकते हैं।

कितना हो सकता है लाभ

एक एकड़ जमीन से औसतन 3 से 5 क्विंटल सूखी अश्वगंधा की जड़ें प्राप्त की जा सकती हैं। बाजार में इसकी कीमत गुणवत्ता के अनुसार 250 से 350 रुपए प्रति किलो तक मिल जाती है। चूंकि इसकी खेती में लागत कम आती है, इसलिए किसानों को अच्छा मुनाफा मिल सकता है।