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रियासत काल में तोपों से स्वागत होता था दीवाली का…

-मिट्टी के दीपों के प्रकाश से जगमगाता था गढ़ भवन पेलेस-अतीत का रंग, दीपावली के संग
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Dynasty was welcomed by guns during the reign of ...

रियासत काल में तोपों से स्वागत होता था दीवाली का...

रियासत काल में तोपों से स्वागत होता था दीवाली का...
-मिट्टी के दीपों के प्रकाश से जगमगाता था गढ़ भवन पेलेस
-अतीत का रंग, दीपावली के संग
-जितेंद्र जैकी-
झालावाड़. शहर में रियासतकाल में दीपावली पर संस्कृति व परम्परा के बीच महापर्व के उल्लास का अलग ही रंग देखने को मिलते थे। उस समय शहरवासी पूरे पखवाड़े दीवाली के विभिन्न कार्यक्रमों का आनंद उठाते थे। गांवड़ी के तालाब के किनारे से तोप की गर्जना ही दीपावली के स्वागत का प्रतीक होती थी। मिट्टी के दीपकों की सुनहरी रोशनी में गढ़ भवन पेलेस अयोध्या के राजमहल के समान स्वर्णिम और वैभवयुक्त हो उठता था। उस समय गढ़ भवन को जनता के लिए दर्शनार्थ खोला जाता था। तत्कालीन महाराजराणा जनता के बीच जाकर उत्साह से दीवाली मनाते थे। गढ़ भवन परिसर में गढडे खोदकर उनमें बांस लगाए जाते थे। बांसों पर मिट्टी के दीपकों की कतार को बड़ी कुशलता से सजाया जाता था। उसमें तेल डाल कर दीपावली की जलाया जाता था। उस समय भवन के सुंदर, आलीशान व विशाल कक्षों को आमजन के अवलोकनार्थ खोला जाता था। इसमें सजी शाही व बहुमूल्यवान कलाकृतियों, शस्त्रों आदि का आमजन परिवार सहित अवलोकन करते थे।
-आमजन के बीच होते महाराजराणा
इतिहासकार ललित शर्मा ने बताया कि दीवाली की रात तत्कालीन महाराजराणा गढ़ भवन में आकर खजाने की पूजा अर्चना करते थे। पूजा के बाद वह पूरे नगर में अहलकारों सहित रोशनी देखने जाते थे। वे सेठ, साहुकारों, आमजन व गरीबों से बड़े आत्मिय भावों से मिलकर उन्हे दीवाली की बधाई देते थे। इस अवसर पर राजपरिवार की ओर से पुरस्कृत भी किया जाता था।
-तोप चलाकर होता था आगाज
दीपावली पर शहर के गांवड़ी के तालाब के निकट स्थित चांदमारी स्थान से राज परिवार की ओर से तोपखाने की गर्जना वाली तोपें चलाई जाती थी जो दिपावली के स्वागत का प्रतीक होती थी। तोपों की गूंज से पूरा नगर पूजा अर्चना शुरु करता और दीपावली का स्वागत कर प्रसन्नता व उल्लास के साथ इसे परम्परागत रुप से मनाता था।
-द्वारिकाधीश में होता था उत्सव
झालावाड़ शहर के अवलोकन के बाद महाराज राणा का काफिला झालरापाटन में द्वारिकाधीश मंदिर में पहुंचता था। यहां वह राज परिवार सहित पूजा अर्चना व आरती करते थे। इसी दिन छप्पन भोग का आयोजन होता था। इसमें हर वर्ग का व्यक्ति शामिल होता था। यह पूजा एक समन्वय आंदोलन के रुप में मनाई जाती थी। गोरधन पूजा के समय महाराजराणा दही का घोल, हल्दी में मिलाकर उपस्थित श्रद्धालुओं पर डालते थे। बाद में प्रसाद वितरण किया जाता था।