टाइम टेबल में ही लगता है खेल पीरियड़

टाइम टेबल में ही लगता है खेल पीरियड़

harisingh gurjar | Publish: Sep, 10 2018 10:50:26 AM (IST) Jhalawar City, Jhalawar, Rajasthan, India

- क्रिडा शुल्क वसूल रहे, ना मैदान व खेल का पता

 

 

हरिसिंह गुर्जर
झालावाड़.राजकीय और निजी शिक्षण संस्थाओं में नियमित रूप से खेल गतिविधियों को लेकर नियम तो सख्त हैं,लेकिन इनका पालन कागजों में अधिक धरातल पर कम ही किया जा रहा है। नियमानुसार पढ़ाई के साथ प्रतिदिन खेल का पीरियड लगना अनिवार्य है, लेकिन ऐसा शायद ही किसी स्कूल में हो रहा है, जबकि टाइम टेबल में जरुर खेल गतिविधियों का जिक्र कर रखा है। ऐसे में राज्यस्तर पर खेल के लिए जिले से बनने वाली टीमों में भी खिलाडिय़ों का प्रदर्शन आशानुरुप नहीं हो पाता है। हालांकि माध्यमिक शिक्षा विभाग में भले ही खेल मैदान सभी विद्यालयों में बन गए हो, लेकिन प्रथम श्रेणी के शारीरिक शिक्षकों के जिले में स्वीकृत सभी पद रिक्त चल रहे है। वहीं निजी स्कूलों में 90 फीसदी स्कूलों में खेल मैदान नहीं है। तो शारीरिक शिक्षक भी नहीं है।
टाइम टेबल में खेल पीरियड-
स्कूलों की समय सारणी में भले ही खेल पीरियड निर्धारित कर रखा हो,लेकिन विद्यार्थी कहीं भी खेल प्रशिक्षक के निर्देशन में खेलते हुए नजर नहीं आते हैं। जो भी बच्चे हाल ही में राज्यस्तर के चयन के लिए जिलास्तरीय खेल प्रतियोगिताएं हो रही है उनमें बच्चे अपने दम पर ही प्रदर्शन कर रहे हैं।

क्रिड़ा शुल्क वसूली फिरभी गतिविधियां नहीं -
प्राइमारी-मिडिल व माध्यमिक शिक्षा के निजी स्कूलों में क्रीडा शुल्क वसूला जा रहा है। खेल गतिविधियों शैक्षणिक कैलेंडर में शामिल रहती है, इसके तहत खेल पीरियड का समय टाइम टेबल में निश्चित कर दिया जाता है,पर गतिविधियां नहीं कराई जाती है। वहीं राजकीय स्कूलों में एसटी, एससी और ओबीसी से 2 रुपए तथा सामान्य क्षेत्र के विद्यार्थियों से पांच रुपए लिए जा रहे हैं।

10 फीसदी में ही मैदान-
जिल में करीब 450 निजी स्कूल है, लेकिन 10 फीसदी में ही खेल मैदानों की सुविधाएं है। जबकि विद्यार्थियों से मोटी फीस वसूली जाती है, इसके बाद भी नियमित खेल की सुविधा विद्यार्थियों को मुहैया नहीं होती है। शहर में ही करीब एक दर्जन ऐसे स्कूल है जिनमें भवन ही भवन है, विद्यार्थियों के खेलने की कोई सुविधा नहीं तो ज्यादातर में खेल प्रशिक्षण भी नहीं है, ऐसे में कैसे विद्यार्थी खेलों में अपना हुनर दिखाएंगे। किसी भी स्कूल में खो-खो, कबड्डी, रस्साकस्सी, बॉलीबाल, टेबल टेनिस आदि की सुविधाएं नहीं है। इसके अलावा ज्यादातर स्कूलों में खेल सामग्री भी नहीं है।
यह कर सकते है, लेकिन नहीं करते-
खेल विशेषज्ञों ने बताया कि जिन स्कूलों में खेल मैदान नहीं है वह निकट के किसी भी खेल मैदान में बच्चों को सप्ताह में दो या तीन दिन ले जाकर खेलों में प्रारंगत कर सकते हैं, लेकिन इस ओर निजी स्कूल संचालक और ना ही सरकारी स्कूलों के शिक्षक ध्यान देते हैं। इससे बच्चों का मानसिक व शारीरिक विकास पर प्रभाव पढ़ता है। खेल से बच्चों को परीक्षा परिणाम भी अच्छा रहता है।
फैक्ट फाइल-
पीटीआई के स्वीकृत पद रिक्त पद
तृतीय श्रेणी 172 16
द्वितीय श्रेणी 124 18
प्रथम श्रेणी 15 15

पढ़ाने का पता नहीं फिरभी दी जा रही ग्रेड-
राजकीय व निजी सभी स्कूलों में शारीरिक विषय का अध्ययन नहीं होता है, इसके बाद भी परिणाम जारी कर गे्रड जारी की जा रही है। जानकारों ने बताया कि नियमानुसार इस विषय का भी पेपर होना चाहिए, छात्रों को पूरे विषय की जानकारी होनी चाहिए।

खेल के दे रखे है निर्देश-
प्रथम श्रेणी के शारीरिक शिक्षकों के सभी पद रिक्त चल रहेहैं, इसकी सूचना निदेशालय बीकानेर भेज रखी है। पदों को वहीं से भरा जाएगा। स्कूलों में सभी शिक्षकों को अपने हिसाब से खेल खिलाने के निर्देश दे रखे हैं।
सुरेन्द्रसिंह गौड़, जिला शिक्षा अधिकारी, माध्यमिक,झालावाड़।

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

Ad Block is Banned