जब देश के नामी उद्योगपति बिरला को हरा दिया था गांव के किसान ने

नौ बार विधायक रही सुमित्रा ङ्क्षसह ने बताया, चुनाव एतिहासिक था। बिरला ने जीत के लिए पानी की तरह पैसे बहाए। शहरों से लेकर गांव ढाणियों तक रजाई, कम्बल व अन्य सामग्रियां बंटवाई। लेकिन उस समय देशभर में एक ही नारा था 'इंदिरा गांधी आई है, नई रोशनी लाई हैÓ। लोगों में जुनून था। किसान व उद्योगपति की इस ऐतिहासिक टक्कर में किसानों ने एकजुटता दिखाई, और जीत शिवनाथ ङ्क्षसह की हुई।
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By: Rajesh

Published: 04 Apr 2019, 01:18 PM IST


झुंझुनूं में एतिहासिक था 1971 का चुनाव
झुंझुनूं. ऐसे तो हर चुनाव की अपनी अलग यादें होती हैं, लेकिन 1971 का चुनाव अपने-आप में ऐतिहासिक था। यहां मुकाबला देश के नामी उद्योगपति बिरला घराने के केके बिरला व किसान शिवनाथङ्क्षसह के बीच हुआ, जिसमें बिरला को करारी हार का सामना करना पड़ा। बिरला की हार देशभर में सुर्खियां बन गई थी।
झुंझुनूं लोकसभा सीट से 1952 से 62 तक के चुनाव में लगातार कांग्रेस के राधेश्याम आर मोरारका तीन बार जीते। चौथे चुनाव में वे हार गए। इसके बाद पांचवें चुनाव (1971) में उनकी जगह कांग्रेस ने पहली बार मोरारका की जगह शिवनाथ ङ्क्षसह गिल को अपना प्रत्याशी बनाया। गिल मूल रूप से उदयपुरवाटी उपखंड की गिलों की ढाणी के रहने वाले थे। पिलानी में जन्मे केके बिरला के पिता घनश्यामदास बिरला की गिनती उस समय देश के शीर्ष उद्योगपतियों में होती थी। वे महात्मा गांधी के भी करीबी थे। पूरे देश की नजर में झुंझुनूं में बिरला का यह चुनाव था।
इस चुनाव में शिवनाथ ङ्क्षसह की चुनाव प्रभारी थी तत्कालीन चिकित्सा एवं स्वास्थ्य तथा जनस्वास्थ्य एवं अभियांत्रिकी मंत्री सुमित्रा ङ्क्षसह। नौ बार विधायक रही सुमित्रा ङ्क्षसह ने बताया, चुनाव एतिहासिक था। बिरला ने जीत के लिए पानी की तरह पैसे बहाए। शहरों से लेकर गांव ढाणियों तक रजाई, कम्बल व अन्य सामग्रियां बंटवाई। लेकिन उस समय देशभर में एक ही नारा था 'इंदिरा गांधी आई है, नई रोशनी लाई हैÓ। लोगों में जुनून था। किसान व उद्योगपति की इस ऐतिहासिक टक्कर में किसानों ने एकजुटता दिखाई, और जीत शिवनाथ ङ्क्षसह की हुई।
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1971 का चुनाव फैक्ट फाइल
-कुल प्रत्याशी 9
-मतदान प्रतिशत 63.02
-शिवनाथङ्क्षसह (कांग्रेस)को मिले मत223286(59.79
-फीसदी)
-केके बिरला (एसडब्ल्यूए) को मिले मत 124337
(33.30 फीसदी)
जीत का अंतर-98949
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फिर गिल नहीं पहुंचे संसद, बिरला 18 साल रहे सांसद
गिल पर जनता ने जो विश्वास कर बिरला को हरवाया था, उस विश्वास पर गिल ज्यादा खरे नहीं उतरे। अगले ही चुनाव में (1977) वे कांग्रेस के टिकट पर करीब एक लाख 6 हजार783 मतों पर सिमट गए। 1971 के चुनाव की तुलना में आधे वोट भी गिल को नहीं आए। इसके बाद वे कभी सांसद नहीं बने। 1977 के चुनाव में गिल को भारतीय लोक दल के कन्हैयालाल से एक लाख 26 हजार 951 मतों से हार का सामना करना पड़ा। वहीं अपने गृह जिले में हार के बाद उद्योगपति केके बिरला 1984 से 2002 तक लगातार तीन बार अठारह वर्ष तक राज्यसभा संासद रहे। कई समितियों के अध्यक्ष भी रहे। जब भी जिले में लोकसभा चुनाव होते हैं तो लोग 1971 के चुनाव की चर्चा जरूर करते हैं।
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