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किसान की मेहनत से महक रही केसर की क्यारी

नवलगढ़ के गांव चेलासी में किसान कर रहा केसर की पैदावार
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jhunjhunu

किसान की मेहनत से महक रही केसर की क्यारी




नवलगढ़. यदि व्यक्ति के मन में कुछ करने का दृढ संकल्प हो तो वह हर कार्य में सफलता पा सकता है। ऐसा ही कर दिखाया है गांव चेलासी के किसान मुरलीधर सैनी ने। उन्होंने अपने खेत में केसर की फसल कर किसानों के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। वह पिछले कई वर्षों से अपने खेत में केसर की फसल से उत्पादन ले रहा है। हालांकि वह अभी छोटे स्तर पर ही इसका उत्पादन कर रहा है। बतौर किसान मुरलीधर सैनी आमतौर पर केसर की फसल श्रीनगर के पम्पोर व किश्तवाड़ा के पुछाल गांव में में होती है। केसर की फसल उसने अपने खेत में भी लगाने की ठानी। उसने केसर की फसल के लिए श्रीनगर से केसर के बलब लाकर प्रयोग के तौर पर अपने खेत में लगाए। दो तीन साल तक उसे सफलता नहीं मिली। फसल से उसे किसी तरह का उत्पादन नहीं मिला। लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने श्रीनगर की शालीमार एग्रीकल्चर समेत जहां पर केसर की फसल होती है उन जगहों का दौरा किया। वहां से इस फसल के बारे में जानकारी ली। इसके बाद उसने अपने खेत में केसर के बलब को दुबारा लगाया। वर्ष २०१२ में उसे केसर से पहली बार उत्पादन मिला। उसे फसल से १०० ग्राम केसर का उत्पादन प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि उसका मकसद यह प्रचारित करना है के क्षेत्र में भी केसर की फसल हो सकती है।

सरकार से सहयोग की दरकार
किसान मुरलीधर सैनी ने बताया कि केसर की फसल के लिए एक बीघा में चार क्विंटल केसर के बलब लगाने पड़ते हैं। जो काफी महंगे होते हैं। ऐसे में हर किसान के लिए इसकी खेती करना संभव नहीं है। सरकार यदि किसानों को इस खेती के लिए सहयोग करे तो इससे क्षेत्र में अच्छे परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

किसानों में केसर को लेकर है भ्रम
किसान मुरलीधर सैनी ने बताया कि किसानों में केसर की खेती को लेकर भ्रम है। कई किसान केसर की खेती के नाम पर कुसुम की खेती कर रहे हैं। उसने इसको लेकर कई किसानों का मार्गदर्शन भी किया है।

अंकुरण के समय करनी पड़ती है सिंचाई
मुरलीधर सैनी ने बताया कि केसर की फसल में अंकुरण के समय सिर्फ एक बार सिंचाई की जरुरत होती है। इसके बाद सिंचाई नहीं करनी पड़ती। राजस्थान की रेतीली मिट्टी में भी इसकी पैदावार की जा सकती है। इसकी बुवाई अगस्त-सितम्बर में की जाती है। फूल आने का समय नवम्बर में रहता है। ३० से ४० दिन तक फूल आते हैं। गेहूं की फसल पकाव के समय केसर की बलब भी तैयार हो जाती है।

हो चुके हैं सम्मानित
क्षेत्र में केसर की फसल करने पर किसान मुरलीधर सैनी को सम्मानित भी किया जा चुका है। वर्ष २०१३ में तत्कालीन जिला कलक्टर जोगाराम उनको प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित कर चुके हैं।

इनका कहना है
केसर की खेती के लिए कम तापमान चाहिए। इसलिए बड़े स्तर पर क्षेत्र में केसर की खेती संभव नहीं है। छोटे स्तर पर खेती की जा सकती है।
सुभाष सीगड़, सहायक कृषि अधिकारी।

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