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संस्कृत पढ़नी है तो जाना होगा गांवों में, राजस्थान के इन जिलों में स्कूल ही नहीं

अन्य संकायों में उच्च शिक्षा के लिए बालक गांवों से शहरों में आते हैं, लेकिन सरकारों ने संस्कृत शिक्षा के साथ भेदभाव कर रखा है।

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राजेश शर्मा
झुंझुनूं. आजादी के 75 साल बाद भी राजस्थान में ऐसे अनेक जिला मुख्यालय हैं, जहां बारहवीं तक के संस्कृत स्कूल नहीं है। अगर किसी बालक-बालिका ने आठवीं संस्कृत से उत्तीर्ण कर ली तो उसे बारहवीं तक की पढाई के लिए कम से कम तीस से पचास किलोमीटर दूर किसी छोटे कस्बे या गांव में जाना पड़ेगा। अन्य संकायों में उच्च शिक्षा के लिए बालक गांवों से शहरों में आते हैं, लेकिन सरकारों ने संस्कृत शिक्षा के साथ भेदभाव कर रखा है। यहां बच्चों को आठवीं के बाद शिक्षा लेने के लिए शहरों से गांवों में जाना पड़ रहा है। ऐसे में अनेक बालक-बालिकाएं आठवीं के बाद संस्कृत की पढाई छोड़ रहे हैं या फिर वे दूसरे संकाय लेकर पढने को मजबूर हो रहे हैं।

वे जिला मुख्यालय जहां वरिष्ठ उपाध्याय स्कूल नहीं
झुंझुनूं,ब्यावर,केकड़ी, शाहपुरा,नागौर,डीडवाना, टोंक,गंगापुर, डीग, झालावाड़, प्रतापगढ़, डूंगरपुर, पाली, जालौर, सांचौर, सिरोही, राजसमंद, भीलवाड़ा, अनूपगढ़, दूदू व हनुमानगढ़ जिले ऐसे हैं, जहां संस्कृत का वरिष्ठ उपाध्याय (बारहवीं तक) स्कूल जिला मुख्यालय पर नहीं है।

केस-01
झुंझुनूं जिला मुख्यालय पर संस्कृत का सरकारी स्कूल आठवीं तक है। किसी बालक को नौंवीं से बारहवीं तक की पढाई करनी है तो उसे साठ किलोमीटर दूर चिराना या लगभग तीस किलोमीटर दूर चिड़ावा जाना पड़ेगा।

केस-02
हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय पर बारहवीं तक का संस्कृत स्कूल नहीं है। अगर बच्चों को आगे पढाई करनी है तो उनको शहर से लगभग 45 किलोमीटर दूर गांव साबुआना के राजकीय वरिष्ठ उपाध्याय संस्कृत स्कूल में जाना पड़ेगा।