4 सितंबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

शहादत में नहीं तो नौकरी देने में भेदभाव क्यों?

चिड़ावा. देश की हिफाजत में शहीद हुए जवानों के परिजनों की नौकरी में दोहरे मापदंड सामने आ रहे हैं। प्रदेशभर से 1971 से 1999 के बीच शहीद हुए सैंकड़ों परिवारों के परिजनों को नौकरी नहीं मिली। उधर, सरकार ने 1947 से 1970 तक शहीद हुए जवानों के एक परिजन को ब्लड रिलेशन के आधार पर नौकरी देने के आदेश दिए हैं। ऐसे में यही नियम 1970 के बाद शहीद हुए जवानों के लिए भी लागू होने की मांग उठ रही है।
3 min read
Google source verification
war widows problems in service

शहादत में नहीं तो नौकरी देने में भेदभाव क्यों?

शहादत में नहीं तो नौकरी देने में भेदभाव क्यों?
-सुरेन्द्र डैला

चिड़ावा. देश की हिफाजत में शहीद हुए जवानों के परिजनों की नौकरी में दोहरे मापदंड सामने आ रहे हैं। प्रदेशभर से 1971 से 1999 के बीच शहीद हुए सैंकड़ों परिवारों के परिजनों को नौकरी नहीं मिली। उधर, सरकार ने 1947 से 1970 तक शहीद हुए जवानों के एक परिजन को ब्लड रिलेशन के आधार पर नौकरी देने के आदेश दिए हैं। ऐसे में यही नियम 1970 के बाद शहीद हुए जवानों के लिए भी लागू होने की मांग उठ रही है।
दरअसल, तीन अक्टूबर 2018 को राज्य सरकार ने अधिसूचना जारी की। जिसके तहत 15 अगस्त 1947 से 31 दिसंबर 1970 के बीच शहीद हुए जवान के किसी एक परिजन को ब्लड रिलेशन के आधार पर सरकारी नौकरी देने की घोषणा की गई। जिससे सैंकड़ों शहीदों के परिजनों को नौकरी की उम्मीद बंधी। मगर अधिसूचना में दी अवधि के बाद के शहीदों के परिवारों पर यह नियम लागू नहीं हो रहा। ऐसे में करीब 27 साल के इस दायरे में शहीद हुए जवानों के परिजनों को नौकरी मिलनी मुश्किल हो रही है। सूत्रों के अनुसार सरकार ने 1971 से शहीद हुए जवानों के किसी एक सदस्य को नौकरी देने के पहले ही आदेश दे दिए थे। मगर यह आदेश 2008 में लागू हो पाए। ऐसे में शहीद के परिवार से नौकरी योग्य परिजन की उम्र पूरी हो चली। हाल ही में जारी अधिसूचना के बाद 1971 से 1999 तक शहीद हुए जवानों के परिजन भी ब्लड रिलेशन के आधार पर किसी एक सदस्य को सरकारी नौकरी दिलवाने की मांग कर रहे हैं।
इसलिए नौकरी से वंचित
शहीद परिजनों की माने तो सरकार ने 1970 के बाद शहीद हुए जवानों के परिजनों को नौकरी देने के आदेश जारी किए। जो कि 2008 में लागू हो पाए। इस बीच 1971 की लड़ाई में शहीद हुए जवानों के परिजनों की उम्र सरकारी नौकरी से पार हो चली। ऐसे में सरकारी नौकरी के नियम का लगभग शहीदों के परिजनों को कोई फायदा नहीं मिला।
ब्लड रिलेशन का नियम हो तो फायदा-
सरकार की ओर से 1970 के बाद शहीद हुए सभी जवानों के लिए ब्लड रिलेशन का नियम लागू हो तो सैंकड़ों परिवारों को फायदा मिल सकता है। परिजनों का कहना है कि इस अवधि के जवानों के बहुत से परिजन नौकरी की बाट जोह रहे हैं।
नियम लागू नहीं तो आंदोलन
1971 से शहीद हुए जवानों के परिजनों को भी ब्लड रिलेशन के आधार पर नौकरी देने की मांग उठ रही है। इस अवधि में शहीद हुए जवानों के परिजन आंदोलन के मूंड में हैं। जिसके लिए कमेटी का गठन किया जा रहा है। शहीद प्रहलाद सिंह मालुपुरा के पुत्र राजेश कुमार ने बताया कि इस समय सीमा में शहीद हुए परिवारों से संपर्क किया जा रहा है।
इन्होंने रखी पीड़ा
सरकारी नौकरी के लिए परिजन एकजुट होने लगे हैं। जिसमें संदीप पिचानवा खुर्द, नरेश सिंह आर्यनगर ठिचौली, राजपालसिंह हीरवा, राजेश मालूपुरा, राजेश मान, संतोष बास मानाका, बिमलादेवी भालोठ, भगवती देवी लोयल, सरोज लोयल, नीमो आर्यनगर, राजकुमार भालोठ, जितेंद्र काकोड़ा आदि शामिल थे।

&मेरी नजर में 1971 के बाद के शहीदों के परिजनों को नौकरी मिल चुकी हैं। अगर कोई वंचित भी रहा है तो कारण रहे हैं। जैसे उम्र ज्यादा, पेट्रोल पंप, गैस एजेंसी लेने, विरांगना द्वारा बच्चों के लिए नौकरी पेंडिंग रखने जैसे कारण रहे होंगे। अगर उक्त कारणों के बाद भी नौकरी नहीं मिली तो वे हकदार हैं। उनको संबंधित सैनिक कल्याण अधिकारी से मिलकर पीड़ा बतानी चाहिए। जिसका निश्चित रूप से समाधान होगा।
शिवसिंह धौलिया, पूर्व जिला सैनिक कल्याण अधिकारी, नीमकाथाना (सीकर)
नौकरी नहीं महज मिले आश्वासन
उदयपुरवाटी उपखंड की भाटीवाड़ पंचायत के बास मानाका निवासी शहीद विरांगना संतोष देवी ने बताया कि उनके पति चार दिसंबर 1971 में शहीद हुए। 2007 में खुद के खर्च पर मूर्तिस्थापना करवाई। नेताओं ने सरकारी नौकरी का खूब आश्वासन दिया। खुद का बेटा नहीं। ब्लड रिलेशन के आधार पर एक परिजन को नौकरी मिलनी चाहिए।

पति-बेटा दोनों शहीद, नौकरी नहीं
बुहाना तहसील के भालोठ गांव की विरांगना विमला देवी ने पति के अलावा बेटा भी देश सेवा में दिया है। एक आंगन से दो-दो शहीद होने के भी सरकारी नौकरी नहीं मिली। विरांगना विमला ने बताया कि उनके पति धर्मचंद 16 दिसंबर 71 को फाजिल्का में शहीद हुए। बेटा नरेशकुमार 7 जुलाई 1999 में कारगिल युद्ध में शहीद हुए। शहीद के किसी भी परिजन को नौकरी नहीं मिली है। घर पर कोई कमाने वाला नहीं। ऐसे में परेशानी हो रही है। सभी के लिए बनाए समान नियम
बुहाना तहसील के मेहराना निवासी राजेश मान ने बताया कि उनके पिता पितराम सिंह 13 दिसंबर 1971 में फाजिल्का(पंजाब) में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। उस समय वे महज 20 दिन की थी। वे बीपीएड कर चुकीं हैं। मगर उम्र ज्यादा होने के कारण सरकारी नौकरी नहीं मिली।

बड़ी खबरें

View All

झुंझुनू

राजस्थान न्यूज़

ट्रेंडिंग