
जोधपुर . दुष्कर्म मामले की जांच करने वाली टीम में शामिल रहे तत्कालीन उप निरीक्षक सत्यप्रकाश का कहना है कि आसाराम व अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के दूसरे ही दिन वे महिला थाने की तत्कालीन प्रभारी मुक्ता पारीक ट्रेन से छिंदवाड़ा रवाना हुए थे। दो दिन दस्तावेज खंगालकर जब्त किए गए, तब सामने आया कि आसाराम गुरुकुल का एकमात्र मालिक है। शिवा के नाम पावर ऑफ अटॉर्नी थी। संचिता उर्फ शिल्पी छात्रावास की वार्डन थी। इन दस्तावेजों से ही आसाराम की भूमिका साबित हुई थी। वर्तमान में भरतपुर जिले में निरीक्षक सत्यप्रकाश ने कहा कि तत्कालीन पुलिस आयुक्त बीजू जॉर्ज जोसफ व डीसीपी अजयपाल लाम्बा के मार्गदर्शन में उन्हें व मुक्ता पारीक को कार्य करने का अवसर मिला।
पांच अफसर, हजारों की भीड़
एडीसीपी सतीशचन्द्र जांगिड़, एसीपी चंचल मिश्रा, निरीक्षक सुभाष शर्मा, एसआई सत्यप्रकाश, मुक्ता पारीक व कांस्टेबल नरसिंहराम को 30 अगस्त को इंदौर स्थित आश्रम भेजा गया था। वहां रात में हजारों समर्थक जमा थे। स्थानीय पुलिस की मदद से जोधपुर पुलिस के अधिकारी व जवानों ने मौका पाकर आसाराम को पकड़कर कार में डाल दिया और आश्रम के पिछले द्वार से बाहर निकल गए। सीधे हवाई अड्डे पहुंचे। वहां से दूसरे दिन हवाई मार्ग से जोधपुर पहुंचे। आसाराम को कार में डालने के दौरान भीड़ में फंसी एसआई मुक्ता ने भागकर कार का पिछला गेट पकड़ा था।
सिर्फ घटनास्थल जोधपुर था, बाकी सभी दूसरे राज्यों में
महिला थाने की तत्कालीन थानाप्रभारी मुक्ता पारीक का कहना है कि जांच के दौरान उच्चाधिकारियों से हर बात पर खुल कर चर्चा होती थी। मामले में घटनास्थल ही जोधपुर था। चारों आरोपी, उनके ठिकाने, यहां तक कि पीडि़ता भी दूसरे राज्य की थी। ऐसे में जांच व कागजी कार्रवाई और दस्तावेज एकत्र करने के लिए कई बार वहां जाना चुनौतिपूर्ण था। आरोपी जो मोबाइल काम ले रहे थे, उसके सिमधारक दूसरे राज्यों में रहते थे। पीडि़ता के बयानों में कोई मनगढंत तथ्य नहीं थे। आसाराम व दो अन्य को सजा मिलने से लोगों में कानून के प्रति विश्वास बढ़ेगा।
Published on:
26 Apr 2018 03:21 pm
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