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Rajasthan News: बिना FIR 10 लड़कियों को रातभर थाने में रखा, हाईकोर्ट ने पुलिस जांच पर उठाए सवाल, अब CBI करेगी जांच

Call Center Case: जोधपुर के थाने में ऑपरेशन साइबर शील्ड के नाम पर जो कुछ हुआ, उसने खाकी की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब अब सीबीआई तलाशेगी। हाईकोर्ट ने पुलिस तहकीकात के जिन विरोधाभासी तथ्यों को उजागर किया है, वे चौंकाने वाले है।

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Rajasthan High Court

राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश, सीबीआई करेगे कॉल सेंटर मामले की जांच। फोटो: पत्रिका

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर के कुड़ी भगतासनी थाने में पिछले साल दर्ज हुए एक कॉल सेंटर मामले में पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूरे प्रकरण की अग्रिम जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी है। इस मामले में पुलिस पर आरोप है कि बिना कोई एफआइआर दर्ज किए दस युवतियों को रातभर पुलिस थाने में हिरासत में रखा गया, जबकि एफआइआर दूसरे दिन दर्ज की कई। कोर्ट ने पुलिस के आचरण को वैधानिक प्रक्रियाओं का खुला उल्लंघन बताया।

न्यायाधीश अनिल कुमार उपमन की एकल पीठ ने कुड़ी भगतासनी थाने में 16 जनवरी, 2025 को दर्ज एफआइआर से जुड़ी याचिकाओं का निस्तारण करते हुए कुड़ी भगतासनी थाने के एसएचओ को एक सप्ताह के भीतर सारा रिकॉर्ड सीबीआई को सौंपने के आदेश दिए है। सीबीआई से रिकॉर्ड मिलने के छह माह में जांच पूरी करने की अपेक्षा की गई है। साथ ही, अधीनस्थ अदालत को तब तक सुनवाई स्थगित रखने का निर्देश दिया गया है, जब तक सीबीआइ अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर देती।

रातभर हिरासत में रखा, अगले दिन एफआइआर

एफआइआर में कॉल सेंटर संचालन के दौरान धोखाधड़ी सहित भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और आइटी अधिनियम की धाराएं लगाई गई थीं। याचिकाकर्ता प्रियंका मेवाड़ा, लक्षिता व अन्य ने आरोप लगाया था कि उन्हें 15 जनवरी, 2025 की शाम को बिना किसी शिकायत के उनके घरों से पकड़ लिया गया और पूरी रात थाने में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया। अगले दिन यानी 16 जनवरी को देर शाम एफआइआर दर्ज की गई।

कोर्ट ने पाया कि 15 जनवरी, 2025 को बिना किसी संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस दस युवतियों को उनके घरों से उठाकर थाने ले आई और पूरी रात अवैध रूप से हिरासत में रखा। राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस के इस कृत्य को बीएनएस की धारा 43 (5) और 179 का सीधा उल्लंघन ठहराया, जो महिलाओं को सूर्यास्त के बाद गिरफ्तार करने और उन्हें थाने में बुलाने पर रोक लगाती है। पीठ ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई से निष्पक्ष और निरपेक्ष जांच पर गहरा संदेह पैदा होता है।

ऑपरेशन साइबर शील्ड की आड़ में यूं कठघरे में आई खाकी

जोधपुर के कुड़ी भगतासनी थाने में पिछले साल ऑपरेशन साइबर शील्ड के नाम पर जो कुछ हुआ, उसने खाकी की साख पर ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब अब सीबीआई तलाशेगी। राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया पुलिस तहकीकात के जिन विरोधाभासी तथ्यों को उजागर किया है, वे चौकाने वाले है। कहानी 15 जनवरी, 2025 की शाम से शुरू होती है। पुलिस प्रियंका मेवाड़ा सहित दस युवतियों को उनके घरों से बलपूर्वक कुड़ी भगतासनी थाने ले जाती है। उस वक्त थाने में कोई एफआइआर तक दर्ज नहीं थी। अगले दिन यानी 16 जनवरी को शाम 3 बजकर 37 मिनट पर एफआइआर दर्ज की गई, लेकिन इस एफआइआर में 15 जनवरी की घटनाओं का कोई जिक्र नहीं था। हाईकोर्ट ने इसे अभियोजन की सच्चाई पर गंभीर संदेह करार दिया है।

आरोप लगा कि तत्कालीन पुलिस निरीक्षक राजेंद्र चौधरी और उप निरीक्षक शिमला ने युवतियों के साथ दुर्व्यवहार किया। कोर्ट ने दोनों अधिकारियों को शपथ पत्र देने और कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया। साथ ही, जांच के लिए एसीपी बोरानाडा आनंदसिंह राजपुरोहित को नोडल अधिकारी बनाया गया, मगर जब रिपोर्ट आई, तो कोर्ट को बड़ा विरोधाभास मिला। याचिकाकर्ताओं के घर के सीसीटीवी में उप निरीक्षक शिमला को सरकारी वाहन में युवतियों को ले जाते हुए स्पष्ट देखा जा सकता है, लेकिन थाने का 15 जनवरी को रात 9 बजे के बाद का सीसीटीवी फुटेज गायब था, जिसे कोर्ट ने गंभीर माना। इसी तरह, 15 जनवरी की दो रोजनामचा प्रविष्टियों में युवतियों को थाने लाने का कोई उल्लेख नहीं था।