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पृथ्वी दिवस विशेष- संरक्षण के हो रहे प्रयास, जन भागीदारी बढ़े तो सुरक्षित होगी पृथ्वी

एक नजर आंकड़ों पर- - करीब 65 लाख यूनिट प्रतिदिन बिजली का उत्पादन होता है यहां से- करीब 40 हजार वाहन पंजीकृत है फलोदी परिवन कार्यालय में- रोजाना 4 ट्रैक्टर ट्रॉली प्लास्टिक होता है कचरे में - जिले के क्षेत्रफल के 1 प्रतिशत से भी कम हिस्से में है वृक्षारोपण महेश कुमार सोनीफलोदी. किसी भी प्रदूषण की बात करें या ओझोन परत के क्षरण या बात करें सिमटते जंगलों और खत्म हो रही जैव विविधता की। तो इन सभी क्रियाकलापों और इनके नकारात्मक प्रभावों के पीछे की तस्वीर में हमारी जीवन शैली है। जिससे हम किसी न किसी प्रकार से हम धरती को नुकसान पंहुचा रहे है। अगर बात करें संरक्षण के प्रयासों की तो, धरती के संरक्षण के प्रयासों की तुलना में हो रहा नुकसान काफी हद तक ज्यादा है। लिहाजा धरती के संरक्षण के लिए जन भागीदारी बढ़ेगी तो इस धरती का भविष्य भी सुरक्षित होगा। आज पृथ्वी दिवस पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों क्रियाकलापों को प्रदर्शित किया गया है। जो हमें क्षेत्र की दोनों तस्वीरों से रूबरू करवाएगी।
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phalodi

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एक नजर सकारात्मक कामों की तरफ-
सौर ऊर्जा- यूं तो देश में बिजली का उत्पादन कई स्रोतों से होता है, लेकिन अधिकांश विद्युत उत्पादन के तरीकों में किसी न किसी प्रकार से प्रदूषण तो होता ही है। अगर हरित ऊर्जा की तरफ नजर डालें तो सौर ऊर्जा व पवन ऊर्जा से विद्युत उत्पादन को पर्यावरण के मित्र के रूप में देखा जाता है। फलोदी क्षेत्र सौर ऊर्जा से विद्युत उत्पादन में अब विश्व में अपनी खास पहचान बना चुका है और यहां एशिया का सबसे बड़ा सोलर पार्क भी स्थापित हो गया है। यहां से रोजाना लाखों यूनिट बिजली का उत्पादन ग्रीन एनर्जी के रूप में हो रहा है। ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में किया गया यह कार्य पर्यावरण के लिहाज से काफी लाभदायक सिद्ध होगा। इसी क्रम में फलोदी शहर में कई घरों की छतों पर सौर ऊर्जा के संयत्र नजर आने लगे है।
वन्यजीवों का संरक्षण- यूं तो कई कारण है जो वन्यजीवों पर कहर बरपा रहे है। जिसमें सिमटते जंगल, खत्म हो रहे प्राकृतिक आवास, खत्म हो रहे प्राकृतिक जलस्रोत शामिल है, लेकिन यहां के वन्यजीव प्रेमियों के प्रयास इस कदर मजबूत है कि वे वन्यजीवों के संरक्षण के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे है। जिसमें चिंकारा का संरक्षण, प्रवासी पक्षी कुरजां का संरक्षण बेहतरीन उदाहरण है। वहीं दूसरी तरफ प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण में फलोदी शहर के लोग व ग्रामीण भी काफी जागरूक है।
दूसरी नजर नकारात्मक है, बता रही जागरूकता की आवश्यकता-
नहीं थम रहा प्लास्टिक का उपयोग- यूं तो प्रदेश में प्लास्टिक कैरी बैग पर पूर्ण रोक लगाने के लिए कानून भी बनाया गया है और पालना नहीं करने पर जुर्माने व सजा का प्रावधान भी है। लेकिन हालात ये है कि कानून बनने के कई साल बीत जाने के बाद भी प्लास्टिक हमारे दैनिक जीवन से बाहर नहीं हो पाया है। प्लास्टिक कैरी बैग से जमीन की उर्वरकता कम होती है। साथ ही पशुओं के लिए भी हानिकारक है।
एक प्रतिशत भूमि पर भी नहीं है वृक्ष- वन नीति के अनुसार कुल क्षेत्रफल के ३३ प्रतिशत हिस्से में वृक्षारोपण होना चाहिए, लेकिन जोधपुर जिले में १ प्रतिशत से भी कम भूमि पर ही वृक्षारोपण है। एैसे में इतना कम वृक्षारोपण प्राकृतिक आपदाओं का कारण भी हो सकता है। वहीं दूसरी तरफ कम वनों के कारण जंगलों की जैव विविधता भी खतरे में है। साथ ही बढ़ रही वाहनों की संख्या और निकलता धुआं भी पर्यावरण के लिए मुसीबत बना हुआ है।
इनका कहना है-
क जोधपुर जिले में कुल 24 हजार हैक्टेयर वनभूमि है। वन नीति के अनुसार कुल ३३ फीसदी क्षेत्रफल में वृक्षारोपण होना चाहिए, लेकिन जिले में 1 प्रतिशत से कम वृक्ष है। वन विभाग द्वारा वृक्षारोपण के लक्ष्य प्राप्त करने, जंगलों व जैव विविधता के संरक्षण में जन भागीदारी आवश्यक है।
नरेन्द्र सिंह , सहायक वन संरक्षक, फलोदी
क सूरज की तपिश से विद्युत उत्पादन पर्यावरण के लिए फायदेमंद है तथा प्रदूषण मुक्त बिजली उपलब्ध करवाता है। आम जन को भी अक्षय ऊर्जा के प्रति जागरूक होकर पर्यावरण संरक्षण में सहयोग करना चाहिए।
जितेन्द्र सोनी, सौर ऊर्जा विशेषज्ञ
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