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टिड्डी से निपटेगी अफ्रीकी देशों की फंगस, संयुक्त राष्ट्र ने तैयार किया बायोपेस्टीसाइड्स

locust news - भारत और पाकिस्तान के लिए भेजे नमूने, बीकानेर स्थित लैब में तैयार की जाएगी अतिरिक्त खेप- केमिकल पेस्टीसाइड से पशु-पक्षियों व मानव को खतरा  
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टिड्डी से निपटेगी अफ्रीकी देशों की फंगस, संयुक्त राष्ट्र ने तैयार किया बायोपेस्टीसाइड्स

टिड्डी से निपटेगी अफ्रीकी देशों की फंगस, संयुक्त राष्ट्र ने तैयार किया बायोपेस्टीसाइड्स


जोधपुर. रेगिस्तानी टिड्डी से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने मेटाराइजम एक्रीडम बायोपेस्टीसाइड्स का ट्रायल शुरू किया गया है। अफ्रीकी देशों केन्या, इथोपिया व सोमालिया के मौसम में सफलतापूर्वक टेस्ट के बाद इसके नमूने भारत व पाकिस्तान भेजे गए हैं। संभवत: अगले सप्ताह तक ये भारत पहुंच जाएंगे।

मेटाराइजम एक्रीडम एक फंगस है। इसे पाउडर रूप में ढालकर बायोपेस्टीसाइड बनाया गया है। पाउडर को ऑयल बेस्ड मीडियम यानी डीजल के साथ मिलाकर टिड्डी पर स्प्रे किया जाता है। टिड्डी पर स्पे्र के बाद इसके फंगस के स्पोर्स टिड्डी के अंदर जाकर वृद्धि करने लगते हैं। ये स्पोर्स 7 से 14 दिन के भीतर टिड्डी के चारों तरफ माइलीन शीट बनाकर घेर लेते हैं और टिड्डी मर जाती है। एक्रीडम का पाउडर भारत आने के बाद बीकानेर स्थित एफएसआईएल (फील्ड स्टेशन फॉर इनवेस्टीगेशन ऑफ लोकस्ट) लैब में गुणन करके यहीं पर बायो पेस्टीसाइड तैयार किया जाएगा।

टिड्डी के अण्डों व हॉपर पर स्प्रे
मेटाराइजम एक्रीडम से टिड्डी को खत्म होने में 7 से 14 दिन लगते हैं, जब तक वयस्क टिड्डी वैसे ही हरियाली चट कर जाएगी। इसका उपयोग टिड्डी के अण्डों और उससे निकलने वाले हॉपर पर किया जाएगा। हॉपर के पंख आने में 10 से 60 दिन लगते हैं तब तक वह मर जाएगा।

जुलाई-अगस्त में राजस्थान में ट्रायल संभव
यह फंगस 20 से 38 डिग्री तापमान और अत्यधिक नमी में काम करती है। ऐसे में जुलाई-अगस्त में राजस्थान का मौसम बायो पेस्टीसाइड के प्रयोग के लिए बेहतर होगा। अप्रेल से जून के दौरान इसे काम में नहीं लिया जा सकेगा।

अफ्रीकी देशों की है फंगस
दरअसल यह फंगस अफ्रीकी देशों में ही होती है जहां टिड्डी का प्रकोप सर्वाधिक है। वैज्ञानिकों ने इसका स्ट्रेन तैयार करके पाउडर बनाया है। मोरक्को में यह हर साल फसलों पर उपयोग में ली जाती है। विश्व के सर्वाधिक टिड्डी प्रभावित देश केन्या, इथोपिया व सोमालिया में पहली बार इसका उपयोग किया गया है।

न्यूरोटॉक्सिक होते हैं केमिकल पेस्टीसाइड
भारत के टिड्डी चेतावनी संगठन (एलडब्ल्यूओ) की ओर से वर्तमान में 96 प्रतिशत मैलाथियान केमिकल पेस्टीसाइड उपयोग में लिया जा रहा है जिसके छिडक़ते ही टिड्डी मर जाती है। हालांकि एलडब्लयूओ के तकनीशियन कृषिगत क्षेत्रों में इसका छिडक़ाव नहीं करते हैं। कृषि विभाग लेमड़ा पेस्टीसाइड का उपयोग कर रहा है। केमिकल पेस्टीसाइड्स न्यूरोटॉक्सिक होते हैं जो पशु-पक्षी व मानव के तंत्रिका तंत्र को हानि पहुंचाते हैं। इनसे लकवा होने व मृत्यु का डर रहता है। गोडावण, चील, बाज, कौवा जैसे पक्षी और कुत्ते, बिल्ली, जंगली लोमड़ी जैसे पशु टिड्डी को भोजन के रूप में खाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्यत: पेस्टीसाइड की दुर्गंध से पशु-पक्षी इन्हें खाने से बचते हैं। अत्यधिक भूख लगने पर वे कभी-कभार इसका सेवन कर लेते हैं। फसलों पर इसके छिडक़ाव से यह मानव की खाद्य शृंखला में शामिल होकर शरीर के विभिन्न अंगों को हानि पहुंचा सकते हैं।