
राजस्थान के जोधपुर महानगर न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-9 की अदालत ने दहेज उत्पीड़न और मारपीट के एक बहुचर्चित मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने भीनमाल निवासी विवाहिता द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमे को झूठा मानते हुए आरोपी पति और सास को दोषमुक्त कर दिया है।
मजिस्ट्रेट चंदन भाटी ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में पूरी तरह असफल रहा है।
इस मामले की शुरुआत साल 2013 में हुई थी, जब भीनमाल निवासी एक महिला ने जोधपुर के रातानाडा निवासी अपने पति और सास के विरुद्ध महिला थाना (पश्चिम) में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
अदालत में सुनवाई के दौरान मामला तब पलट गया जब परिवादिया और उसके परिजनों के बयानों की जिरह शुरू हुई।
अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में तालमेल की कमी थी। कोर्ट ने आरोपी पति और सास को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए (दहेज प्रताड़ना), 406 (अमानत में खयानत/स्त्रीधन) और 323 (मारपीट) के आरोपों से 'संदेह का लाभ' देते हुए बरी कर दिया। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता हेमन्त बावेजा ने पैरवी की और सबूतों के अभाव को कोर्ट के सामने रखा।
यह फैसला उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो आपसी विवादों को सुलझाने के बजाय सख्त कानूनों का सहारा लेकर झूठे मुकदमे दर्ज करवाते हैं। 13 साल तक चले इस ट्रायल ने न केवल आरोपियों का समय बर्बाद किया, बल्कि उन्हें मानसिक और सामाजिक पीड़ा भी दी। जोधपुर कोर्ट का यह निर्णय "न्याय में देरी, न्याय की मनाही है" की कहावत को चरितार्थ करता है, लेकिन अंततः सत्य की जीत हुई।
हाल के वर्षों में राजस्थान में 498ए के मामलों में एफआर (Final Report/झूठा मामला) लगने की दर में बढ़ोतरी हुई है। राजस्थान पुलिस और न्यायपालिका अब ऐसे मामलों में बेहद बारीकी से जांच कर रही है ताकि निर्दोषों को सजा न हो।
Published on:
17 Mar 2026 11:47 am
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