
फेरे की फोटो- AI, कोर्ट की फाइल फोटो
Hindu Marriage : पारिवारिक न्यायालय संख्या-1 के न्यायाधीश सतीशचंद्र गोदारा ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 07 के तहत सप्तपदी के बिना विवाह वैध नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर न्यायालय ने शून्य विवाह घोषित करने की याचिका खारिज कर दी।
मामले में चांदपोल निवासी महेन्द्रसिंह ने याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उसकी पत्नी ने पूर्व पति से विधिवत तलाक लिए बिना उससे विवाह किया, जबकि वह पहले किसी अन्य युवक से आर्य समाज, जोधपुर में विवाह कर चुकी थी। इसलिए उसके साथ हुआ विवाह अवैध घोषित किया जाए।
पत्नी की ओर से अधिवक्ता राजेन्द्रसिंह बाघेला ने तर्क दिया कि प्रस्तुत आर्य समाज विवाह प्रमाण-पत्र में केवल ‘पाणिग्रहण संस्कार’ का उल्लेख है, सप्तपदी का नहीं। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 07 के अनुसार अग्नि के समक्ष वर-वधू द्वारा संयुक्त रूप से सात फेरे (सप्तपदी) लेना वैध विवाह की अनिवार्य शर्त है।
न्यायालय ने माना कि प्रमाण-पत्र क्रमांक 385/2011 दिनांक 8 फरवरी, 2011 में सप्तपदी का उल्लेख नहीं है। पाणिग्रहण संस्कार और सप्तपदी अलग-अलग विधियां हैं तथा वैध हिन्दू विवाह के लिए सप्तपदी आवश्यक है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने पति की याचिका अस्वीकार कर दी।
Published on:
19 Feb 2026 10:02 am
