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Patrika Keynote: मीडिया शब्द से पत्रकारिता की छंटनी होनी चाहिए, दोनों अलग-अलग हैं: जस्टिस टाटिया

Patrika Keynote: पत्रिका समूह के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चंद्र कुलिश के जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में जोधपुर में लोकतंत्र और मीडिया विषय पर पत्रिका की-नोट के तहत संवाद का आयोजन हुआ। समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कहा- 'लोकतंत्र के केवल तीन ही स्तंभ हैं, मीडिया केवल तीनों के बीच सेतु का काम कर रहा है।

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Patrika Keynote

पत्रिका की-नोट कार्यक्रम (फोटो- पत्रिका नेटवर्क)

जोधपुर। झारखंड हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश व राजस्थान मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश टाटिया ने कहा कि मीडिया शब्द मुंबई की किसी लोकल ट्रेन की तरह लगता है जो भी आया, मीडिया में बैठ रहा है। वास्तव में मीडिया व पत्रकारिता अलग-अलग हैं। मीडिया से पत्रकारिता की छंटनी होनी चाहिए। लोग विचारधारा का प्रचार करने के लिए न्यूज चैनल खोलकर बैठ गए, जबकि पत्रकारिता इससे बिल्कुल अलग है। उन्होंने यह विचार गुरुवार को संवाद श्रृंखला 'पत्रिका की-नोट' में व्यक्त किए।

पत्रिका समूह के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चंद्र कुलिश के जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में 'लोकतंत्र और मीडिया' विषय पर 'पत्रिका की-नोट' का आयोजन पाल बालाजी मंदिर के पास स्थित होटल मधुरम रॉयल में किया गया। मुख्य वक्तव्य पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने दिया। उन्होंने मीडिया को लोकतंत्र का चौथा पाया कहे जाने की अलग तरह से व्याख्या की। विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू) जोधपुर की कुलगुरु प्रो. हरप्रीत कौर और महाराणा प्रताप अवॉर्डी एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता धावक घमण्डाराम डूडी थे। अध्यक्षता ग्रैमी अवॉर्ड विजेता मोहन वीणा के जनक पंडित विश्व मोहन भट्ट ने की।

यहां देखें पूरा कार्यक्रम-

न्यायालय की अवमानना करने पर IAS क्यों कटघरे में खड़े होते हैं?

जस्टिस टाटिया बोले कि उन्हें न्यायपालिका में इस साल 50 साल पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन उन्हें आज तक यह समझ में नहीं आया कि न्यायपालिका की अवमानना होने पर आइएएस सहित अन्य अफसर क्यों कटघरे में खड़े होते हैं जबकि वे सरकार के अधीन हैं। सरकार ही असेम्बली में कानून बनाती है, जबकि कार्यपालिका तो केवल लागू करती है।

मीडिया के सामने दिक्कत, जनता सामने नहीं आ रही

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कहा कि लोकतंत्र के केवल तीन ही स्तंभ हैं। मीडिया केवल तीनों के बीच सेतु का काम कर रहा है। इस समय मीडिया के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जनता कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही है। जनता सामने ही नहीं आ रही। वह पथरा गई है। खुद के बच्चे को तकलीफ है तो जागेंगे, पड़ोसी से कोई लेना-देना नहीं। इसी क्रम में कोठारी ने सभागार में उपस्थित लोगों से कहा- 'मीडिया उसी बात को उठा सकता है जिसमें आपका और मेरा साथ है।'

पत्रिका की तरह अन्य संस्थान भी प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराएं

एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक विजेता धावक घमण्डाराम डूडी ने कहा कि 'मैं खिलाड़ी हूं इसलिए खेल की ही बात करूंगा। प्रदेश में टैलेंट की कोई कमी नहीं है। कोई भी एक दिन में पीटी उषा नहीं बन सकता। जरूरत है तो प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने की। राजस्थान पत्रिका ने 'पाई ओलम्पिक' के जरिए प्रदेश को कई खिलाड़ी दिए हैं। अगर पत्रिका की तर्ज पर अन्य संस्थान भी ऐसे ही कदम उठाएं तो राजस्थान का नाम और अधिक रोशन होगा।'

मीडिया की जिम्मेदारी लोकतंत्र के लिए अनिवार्य

राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय जोधपुर की कुलगुरु प्रो. हरप्रीत कौर ने कहा कि मीडिया, न्यायपालिका और लोकतंत्र में गहरा संबंध है। मीडिया ने कानून के शासन को मजबूत किया और न्यायपालिका ने इसमें उसका समर्थन किया है। वर्तमान दौर में मीडिया के समक्ष कई चुनौतियां हैं। उस पर न्यायपालिका की प्रतिक्रिया, मीडिया की नैतिकता और जवाबदेही का प्रश्न भी है। आज डिजिटल प्लेटफार्म, डीपफेक और दुष्प्रचार जैसी चुनौतियों के बीच मीडिया की जिम्मेदारी और विश्वसनीयता लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य है।

पत्रिका ने क्रांति का काम किया

ग्रैमी अवार्ड विजेता पं विश्व मोहन भट्ट ने कहा कि पत्रिका ने जनमानस में क्रांति का काम किया है। इसमें श्रद्धेय कुलिश जी का बड़ा योगदान है। 'मैं जब अमरीका से ग्रैमी अवॉर्ड लेकर आया तो उन्होंने ही सरकार को ग्रैमी अवॉर्ड का महत्व बताया था और मेरे राजकीय नागरिक अभिनंदन के लिए प्रेरित किया था। पत्रिका ने राजस्थानी लोक कला, संस्कृति को बढ़ावा देने और सहेजने में भी उल्लेखनीय कार्य किया है।'


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