
संदीप पुरोहित
जोधपुर संभाग की उच्च शिक्षा व्यवस्था इस समय एक नाजुक दौर से गुजर रही है। वर्तमान परिस्थितियों में यह प्रश्न खड़ा हो गया है कि पश्चिमी राजस्थान में स्थापित विश्वविद्यालय अपनी मूल भावना और उद्देश्य के अनुरूप कार्य कर रहे हैं? अब समय आ गया है कि इनका गहन विश्लेषण किया जाए, साथ ही संरचनात्मक पुनर्गठन पर गंभीरता से विचार किया जाए। विशेष रूप से सरदार पटेल पुलिस सुरक्षा एवं दांडिक न्याय विश्वविद्यालय और एमबीएम विश्वविद्यालय के संदर्भ में। क्या इनको जयनारायण विश्वविद्यालय में समाहित या संरचनात्मक रूप से एकीकृत किया जाए?
वर्ष 2012 में स्थापित सरदार पटेल विश्वविद्यालय आंतरिक सुरक्षा, आपराधिक न्याय और साइबर अपराध जैसे विशेष क्षेत्रों में विशेषज्ञता विकसित करने के लिए बनाया गया था। किंतु डेढ़ दशक के बाद भी यदि बुनियादी ढांचा अधूरा हो, अपना ऑर्डिनेंस तक तैयार न कर पाया हो, नियमित प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के सभी पद रिक्त हो तथा छात्र संख्या लगभग 200 के आसपास सिमटी गई हो, तो यह स्वाभाविक है कि इसकी कार्यक्षमता पर प्रश्न उठें। एक स्वतंत्र विश्वविद्यालय के रूप में इसकी स्थिरता और प्रभावशीलता पर पुनर्विचार आवश्यक प्रतीत होता है। इसे जयनारायण व्यास विवि से जोड़ते हुए सरकार इसे एक एक्सीलेंसी सेंटर के रूप में विकसित करें तो ज्यादा बेहतर रहेगा, जिसमें इसकी स्वायत्ता का भी ध्यान रखा जाए।
इसी प्रकार 2021 में स्थापित एमबीएम विश्वविद्यालय को तकनीकी और इंजीनियरिंग शिक्षा के विशिष्ट केंद्र के रूप में विकसित करने की मंशा थी। किंतु बाद में सामान्य संकायों को जोड़ देने से उसकी मूल तकनीकी पहचान धुंधली पड़ गई। परिणामस्वरूप वह न तो पूर्णत: विशिष्ट तकनीकी विश्वविद्यालय बन पाया और न ही स्पष्ट अकादमिक दिशा प्राप्त कर सका। यह स्थिति बताती है कि केवल संस्थान बना देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य की निरंतरता और संसाधनों की उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यह उल्लेखनीय है कि यह पूर्व में जयनारायण व्यास विवि का करीब 60 साल तक इंजीनियङ्क्षरग फैकल्टी रहा है।
जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय लंबे समय से संभागीय उच्च शिक्षा का आधार स्तंभ रहा है। लगभग डेढ़ लाख विद्यार्थियों के साथ यह प्रदेश के सबसे बड़े विवि में से एक है। यद्यपि यहां भी स्वीकृत पदों की तुलना में शिक्षक संख्या कम है, फिर भी प्रशासनिक ढांचा, विविध संकाय और व्यापक संसाधन इसे क्षेत्रीय एंकर संस्थान बनाते हैं।
यह प्रश्न उठना भी लाजमी है कि क्या पुलिस विश्वविद्यालय और एमबीएम विश्वविद्यालय का व्यास विश्वविद्यालय में विलय या संरचनात्मक एकीकरण एक व्यावहारिक समाधान हो सकता है? यह बात तो तय है कि पूर्ण विलय से प्रशासनिक दोहराव कम होगा। संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा। फैकल्टी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है। पुलिस एवं साइबर सुरक्षा समाज के लिए अति महत्वपूर्ण है इसलिए इसे विशेष दर्जा देना होगा। वहीं इंजीनियरिंग को स्वतंत्र महाविद्यालय के रूप में संचालित किया जाए तो उसकी पहचान और विशेषज्ञता बनी रहेगी।
यह भी ध्यान रखना होगा कि संसाधनों के नाम पर स्वायत्तता खत्म नहीं हो जाए। साथ ही सभी कर्मचारियों को विश्वास में लिया जाए और उनके रोजगार पर आंच नहीं आए। सरकार को चाहिए कि इनके विलय की पूरी कार्य योजना को ढंग से अंजाम दे। सीधा और त्वरित विलय समाधान नहीं, बल्कि सुविचारित और चरणबद्ध पुनर्गठन ही अधिक उपयुक्त होगा।
'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' या 'स्कूल मॉडल' अच्छा संतुलित विकल्प है। इसके तहत पुलिस एवं साइबर अध्ययन तथा इंजीनियरिंग एवं तकनीकी शिक्षा को व्यास विश्वविद्यालय के भीतर विशिष्ट, अद्र्ध-स्वायत्त इकाइयों के रूप में संचालित किया जा सकता है। प्रशासनिक और वित्तीय ढांचा साझा हो, लेकिन अकादमिक पहचान संरक्षित रहे। इससे अंतरविषयक शोध, विशेषकर साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल फॉरेंसिक जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाएं खुल सकती हैं।
हमारा दृष्टिकोण किसी संस्था को समाप्त करने का नहीं, बल्कि उसे और अधिक प्रभावी और जीवंत बनाने का है। यदि वर्तमान संरचना अपने लक्ष्य पूरे नहीं कर पा रही, तो पुनर्गठन पर विचार करना दूरदर्शिता का परिचायक है। जोधपुर को संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता और उत्कृष्टता के आधार पर उच्च शिक्षा का केंद्र बनाना ही हम सबका मूल उद्देश्य होना चाहिए। हमें क्वालिटी एजुकेशन पर फोकस करना चाहिए न कि नंबर ऑफ इंस्टीट्यूट पर। क्वांटिटी से हमेशा क्वालिटी बेहतर रहती है।
sandeep.purohit@in.patrika.com
Published on:
21 Feb 2026 07:29 pm
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