
उपभोक्ता अदालत में एकल सदस्य की ओर से पारित आदेश अपास्त
जोधपुर.
राजस्थान उच्च न्यायालय में वरिष्ठ न्यायाधीश संदीप मेहता ने गुरुवार को महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि उपभोक्ता सरंक्षण अधिनियम 1986 के तहत राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग का एक सदस्य न तो प्रकरण या अपील की सुनवाई कर सकता है और न ही आदेश जारी कर सकता है। आज से ऐसी कोई सुनवाई या निर्णय गैर कानूनी होगा।
हालांकि इस आदेश का भूतलक्षाी प्रभाव नहीं होगा। इसके साथ ही उन्होंने दायर की गई नौ याचिकाओं में एकल सदस्य की ओर से पारित आदेश गैर कानूनी करार देते हुए राज्य आयोग के आदेश अपास्त कर दिए।
उन्होंने राज्य सरकार और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति सचिव को निर्देश दिया कि राज्य आयोग की जोधपुर चलपीठ सहित अन्य जगह और जिला मंच में सभी रिक्तियों को 3 माह में भरकर आगामी 31 जनवरी को पालना रिपोर्ट पेश करें।
याचिकाकर्ता जैन समाज गोशाला ट्रस्ट, रुकमा कंवर व जोधपुर विकास प्राधिकरण व अन्य की ओर से अधिवक्ता अनिल भण्डारी, राजेश चौधरी, सुनील भण्डारी, अमित आचार्य व अन्य ने कहा कि उपभोक्ता सरंक्षण अधिनियम 1986 की धारा 14 में स्पष्ट है कि जिला मंच कम से कम दो सदस्य की सुनवाई के बाद आदेश पारित करेंगे और धारा 18 में कहा है कि यह प्रावधान राज्य आयोग में लागू होंगे। इसलिए एकल सदस्य द्वारा पारित आदेश अपास्त किए जाएं।
राज्य सरकार व अन्य अप्रार्थीगण की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता पीआर सिंह, जगदीश व्यास, एलआर बिश्नोई ने कहा कि राज्य आयोग के अध्यक्ष को यह अधिकार है कि धारा 16 के तहत चलपीठ में एकल सदस्य ही सुनवाई कर आदेश जारी कर सकता है।
तब तो जिला न्यायधीश के आदेश स्नातक सदस्य भी रद्द कर सकेगा
वरिष्ठ न्यायाधीश मेहता ने कहा कि धारा 14(2ए) व धारा 16(1बी) में यह प्रावधान है कि दो सदस्यों में विरोधी निर्णय होने पर तीसरे सदस्य के पास मामला प्रेषित किया जाएगा। यदि एक ही सदस्य सुनवाई कर आदेश या फैसला देंगे तो तीसरे सदस्य को प्रकरण प्रेषित करने के प्रावधान औचित्यहीन हो जाएंगे।
उन्होंने कहा यदि अप्रार्थीगण की बात स्वीकार कर ली जाती है तो जिला मंच के आदेश जो कि पूर्व जिला न्यायाधीश व अन्य सदस्य द्वारा पारित किए जाते हैं, को राज्य आयोग का एक स्नातक डिग्रीधारी सदस्य भी पलट या रद्द कर सकता है। वह स्थिति भयावह व हैरान करने वाली हो जाएगी।
उन्होंने फैसले में कहा कि गत 16 मई को सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखने के बाद राज्य सरकार ने राष्ट्रीय आयोग का कार्यालय आदेश पेश किया था। उसमें भी यही कहा गया है कि न्यायिक सदस्य यदि गैर न्यायिक सदस्य से कनिष्ठ है तो भी पीठ की अध्यक्षता न्यायिक सदस्य ही करेगा।
Published on:
26 Oct 2018 01:49 am
