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Health Alert: मासूम सा दिखने वाला कबूतर आपको पहुंचा रहा अस्पताल, हवा में घोल रहा धीमा ‘जहर’, विशेषज्ञों ने दी चेतावनी

Disease from pigeons: शहरों में तेजी से बढ़ती कबूतरों की संख्या अब स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है, जहां उनकी बीट और पंख हवा को संक्रमित कर रहे हैं।

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फाइल फोटो- पत्रिका

जोधपुर। कहानियों और कथाओं में कभी संदेशवाहक माने जाने वाले कबूतर अब स्वास्थ्य के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। देश के अन्य शहरों की तरह राजस्थान में भी कबूतरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार शहरीकरण, ऊंची इमारतों की बढ़ती संख्या और लोगों की ओर से नियमित रूप से दाना डालने की प्रवृत्ति ने इनके लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर दिया है। मारवाड़ क्षेत्र में खुले भवन, छज्जे और पानी की उपलब्धता के कारण इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।

स्वास्थ्य के लिए हानिकारक

वन्यजीव और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि एक कबूतर वर्षभर में लगभग 10 से 12 किलोग्राम तक बीट करता है, जो सूखकर धूल के रूप में हवा में मिल जाती है। इसमें मौजूद फंगस सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा कबूतरों के झड़ते पंख और सूक्ष्म कण भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माने जाते हैं।

सांसों के लिए संकट

कबूतरों की बीट और पंखों से कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इनमें प्रमुख रूप से हिस्टोप्लाज्मोसिस शामिल है, जो फेफड़ों को प्रभावित करती है। इसके अलावा क्रिप्टोकोकोसिस भी बीट में पनपने वाले फंगस से फैलने वाली बीमारी है। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस जैसी एलर्जीजनित फेफड़ों की समस्या हो सकती है, जिससे सांस लेने में तकलीफ, खांसी और थकान बढ़ जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जिन स्थानों पर बड़ी संख्या में कबूतर रहते हैं, वहां रहने वाले लोगों में एलर्जी, अस्थमा और अन्य श्वसन संबंधी समस्याएं बढ़ने का खतरा अधिक रहता है। खासकर बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों के लिए यह स्थिति ज्यादा जोखिम भरी हो सकती है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से सांस फूलना, सीने में जकड़न और लगातार खांसी जैसी शिकायतें सामने आती हैं।

डेढ़ गुणा रफ्तार

विशेषज्ञों के अनुसार पिछले दो दशकों में कबूतरों की संख्या में लगभग डेढ़ गुना वृद्धि हुई है। पहले खुले स्थानों तक सीमित रहने वाला यह पक्षी अब घरों की छतों, आंगनों और खिड़कियों तक पहुंच चुका है। शहरी क्षेत्रों में इनके बढ़ते जमावड़े को नियंत्रित करना अब एक चुनौती बनता जा रहा है।