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नाबालिग बेटी से बलात्कार: राजस्थान हाईकोर्ट ने पिता की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी, कहा- दया की गुंजाइश नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी से बलात्कार के दोषी पिता की अपील खारिज कर ट्रायल कोर्ट की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। कोर्ट ने कहा कि पिता जैसा संरक्षक यदि बेटी की गरिमा भंग करे तो अपराध घृणित हो जाता है। इसमें किसी प्रकार की दया संभव नहीं।

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Final hearing on 27 percent reservation for OBCs in MP on January 21

Final hearing on 27 percent reservation for OBCs in MP on January 21 (Patrika File Photo)

जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी के साथ बलात्कार के दोषी पिता की आपराधिक अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब एक पिता जैसा अभिभावक अपनी बेटी की गरिमा का हनन करता है, तो यह अपराध सामान्य नहीं रह जाता। यह परिवार, विश्वास और बचपन की सुरक्षा की अवधारणाओं पर सीधा हमला बन जाता है। दया के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता।

न्यायाधीश विनीत कुमार माथुर और न्यायाधीश चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने डूंगरपुर की विशेष पॉक्सो अदालत के 14 नवंबर, 2022 के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ आरोध को उचित संदेह से परे साबित कर दिया था। खंडपीठ ने पाया कि पीड़िता की गवाही पूर्ण विश्वास जगाती है। अपनी कोमल उम्र के बावजूद, उसका सबूत स्वाभाविक, ठोस और सुसंगत है और उसमें सच्चाई की छाप है।

उनकी गवाही देने की क्षमता का अदालत ने उचित मूल्यांकन किया था और उन्होंने सवालों के जवाब बुद्धिमानी से और बिना किसी पूर्व में सिखाए अनुसार दिए। उनके बयान में कोई भौतिक विरोधाभास नहीं था। स्वयं अपराध की पीड़ित होने के नाते और अपने ही पिता को झूठे फंसाने का कोई कारण न होने के कारण, उनकी गवाही घटना का सबसे अच्छा संभव सबूत है।

पीठ ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा-114 (ए) के तहत, एक बार पीड़ित ने अपने सबूत में कह दिया कि उसने यौन कृत्य के लिए सहमति नहीं दी, तो यह अनुमान लगाया जाता है कि उसने सहमति नहीं दी। वर्तमान मामले में पीड़िता 12 वर्ष से कम उम्र की नाबालिग है और इसलिए सहमति का सवाल ही नहीं उठता।

'अपराध घृणित और विकृत चरित्र ग्रहण कर लेता है'

खंडपीठ ने कहा कि यौन अपराध, विशेष रूप से बच्चों के खिलाफ किए गए, ऐसे घाव देते हैं जो कृत्य की तात्कालिकता से कहीं आगे तक बने रहते हैं। जो आघात सहा जाता है, वह शारीरिक चोट तक सीमित नहीं होता। बल्कि पीड़ित के मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक कोर में गहराई तक प्रवेश कर जाता है, जिससे विश्वास, सुरक्षा और मानव गरिमा को ठेस पहुंचती है।

जब अपराधी पिता हो, जो बच्चे के प्राकृतिक संरक्षक के रूप में न्यासी होता है तो अपराध सामान्य अपराधिकता से आगे निकल जाता है। एक घृणित और विकृत चरित्र ग्रहण कर लेता है। इस प्रकृति के अपराधों के लिए सबसे मजबूत न्यायिक निंदा और उनकी गंभीरता के अनुरूप निवारक सजा की आवश्यकता होती है।

इस तरह की नैतिक पतनशीलता के प्रति किसी भी तरह की रियायत या गलत जगह दया न केवल न्याय प्रशासन को कमजोर करेगी, बल्कि यौन शोषण से बच्चों की सुरक्षा के संवैधानिक और वैधानिक दायित्व का गंभीर परित्याग होगा। इसके साथ ही कोर्ट ने पीड़िता को अधिकतम मुआवजा प्रदान करने के निर्देश दिए हैं।

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