
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बी.आर. गवई ने कहा कि भारतीय संविधान में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का बेहतरीन समावेश है। इनका अस्तित्व अलग-अलग नहीं है, बल्कि ये साथ-साथ हैं। संविधान की प्रस्तावना और मूल में इन्हीं तत्वों की मौजूदगी सामाजिक-आर्थिक न्याय को सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभा रही है।
राजस्थान हाईकोर्ट के प्लेटिनम जुबली वर्ष के उपलक्ष्य में शनिवार को राजस्थान राज्य न्यायिक अकादमी में ‘डॉ. अंबेडकर के विचार में सामाजिक, आर्थिक न्याय और न्यायिक सक्रियता से सामाजिक इंजीनियरिंग’ विषय पर आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए गवई ने कहा कि 1947 से पहले देश को आजाद करवाने के लिए एक जंग लड़ी जा रही थी, लेकिन उसके साथ-साथ सामाजिक व आर्थिक असमानता व असंतुलन की लड़ाई भी चल रही थी। इसलिए जब हमारा संविधान तैयार किया जा रहा था, उसके बैकग्राउंड में यह एक महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु था। उन्होंने कहा कि डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में अपना मत रखते हुए स्पष्ट कहा था कि यदि नागरिक अधिकार बिना किसी उपचारों के सुनिश्चित करने की परिकल्पना की जाएगी, तो वह बेमानी होगा और सामाजिक-आर्थिक न्याय संभव नहीं है। यह मत न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्ट की अंतनिर्हित शक्तियों को संविधान में शामिल करने का आधार बना। गवई ने कहा कि सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र अर्थहीन हो जाता। इसी विचार से संविधान में तीसरा और चौथा चैप्टर जोड़ा गया।
इस अवसर पर न्यायाधीश संदीप मेहता ने कहा कि नागरिक अधिकारों को परिभाषित करने में समय-समय पर न्यायिक सक्रियता ने योगदान दिया है। इस अवसर पर अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने भी विचार रखे। इससे पहले राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव ने हाईकोर्ट की स्थापना से जुड़े संस्मरणों को साझा किया। अंत में न्यायाधीश डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
ई-लॉ रिपोर्ट का लोकार्पण
सेमिनार से पहले न्यायाधीश बी.आर. गवई व न्यायाधीश संदीप मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की मौजूदगी में अदालती फैसलों को लेकर डिजिटल फॉर्मेट में तैयार ई-लॉ रिपोर्ट का लोकार्पण तथा हाईकोर्ट से न्यायिक अकादमी तक की रोड का ‘न्याय पथ’ के रूप में उद्घाटन किया।
Published on:
17 Mar 2024 11:04 am
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