
पुरातत्व विभाग की अनदेखी के कारण मारवाड़ की विरासत उपेक्षित है। शहर से 15 किलोमीटर दूर स्थित धांधल राठौड़ों से जुड़ी कलात्मक छतरियां दुर्दशा की शिकार हैं।

स्थापत्य कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण छतरियों के जर्जर हो चुके गुम्बद गिरने के कगार पर हैं।

समय रहते पुरा सम्पदा का संरक्षण नहीं होता है, तो यह सम्पदा नष्ट होने के साथ किसी हादसे का भी सबब बन सकती हैं।

पुरातत्व विभाग की अनदेखी के कारण मारवाड़ की विरासत उपेक्षित है। शहर से 15 किलोमीटर दूर स्थित धांधल राठौड़ों से जुड़ी कलात्मक छतरियां दुर्दशा की शिकार हैं।

अतीत के झरोखे गवाह हैं कि धांधल राठौड़ों के पाटवी ठिकाना केरू का मारवाड़ के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

केरू में धांधल गोयनदास (वि.सं. 1775), धांधल मनोहरदास (वि.सं. 1777), धांधल विहारीदास (वि.सं. 1805), धांधल नारायणदास और धांधल गोविन्ददास के पुत्र प्रेमसिंह की छतरियों के अलावा इनके रणिवास के भी स्मृतिसूचक पगलिये सहित क्षेत्र में करीब 25 स्मारक स्थल मौजूद हैं, जो वर्तमान में खण्डहर होने के कगार पर हैं।

राजस्थानी शोध संस्थानकेरू ठिकाने के धांधल राठौड़ों ने जोधपुर राज्य के रसोड़े की दरोगाई के अलावा मुसाहिबी के साथ ही सोजत, मेड़ता और नागौर की कोतवाली का पद बड़ी निष्ठा के साथ निभाया था। विभिन्न युद्ध अभियानों में धांधल राठौड़ों की भूमिका रही। उनके वंशजों ने केरू के दग्ध स्थल में विशाल कलात्मक छतरियों का निर्माण भी करवाया। -डॉ. विक्रमसिंह भाटी, सहायक निदेशक