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यमुनापट्टी के गांवों में शुरू हो गई फाग, गूंजने लगी शराफत के ढोलक की थाप

दर्जनों गांवों में होली से पहले फाग की रियाज, यहां पर चली आ रही सैकड़ों साल की पुरानी परम्परा

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 दर्जनों गांवों में होली से पहले फाग की रियाज, यहां पर चली आ रही सैकड़ों साल की पुरानी परम्परा

कानपुर। हटिया की होली के रंग-गुलाल में क्रांति की खुशबू झलकती है तो यमुना पट्टी से सटे गांवों में सैकड़ों साल से चली आ रही फाग का कोई जोड़ नहीं है। गंगावासी हटिया होली को कामयाब बनाने के जिए लगे हैं तो वहीं यमुनावाले भी फाग का रियाज कर रहे हैं। गांवों में फाग की जमातें सजने के साथ ढोलक की थाप,हारमोनियम व झींके की धुनों के बीच मोहन नंद लाल बरसाने नहिं आए व होली खेलैं रघुवीरा बिरज मां होली.. जैसे गीत गूंजने लगे हैं। शराफत की ढोलक की थाप तो अफसाक की फाग से लोग मंत्रमुग्ध हो रहे हैं। रंग-गुलाल उड़ाती, होली की मस्ती में झूमती केसरिया निशान के साथ यमुना पट्टी के गांवो में फाग और ढोलक की थाप शुरु हो गई है। ग्रामीण होली के फागुनी गीत ...आयो फागुड मेलो, श्याम म्होरो हेलो’ गायक होली के लिए अभी से रियाज करने में जुट गए हैं।
ग्रामीणों ने फाग की रियाज शुरू की
बुंदेलखंड से सटे घाटमपुर तहसील के दर्जनों गांवों में होली पर्व को लेकर ग्रामीण फाग की रियाज शुरू कर दी है। गांववाले शाम को मंदिर में फाग गाकर अपनी पुरानी परंपरा को जिवित रखे हुए हैं। होली पर फागुनी रंग निराला होता है। बुंदेलखंड में होली पर फाग का अलग आलम रहता है। इसकी छाप जिले के यमुना बेल्ट के गांवों शाहजहांपुर, बिझौना, बैजामऊ, बेहमई, हरिहरपुर, खोजारामपुर, महेशपुर, ऊमरपुर, भाल दमनपुर आदि गांवों में दिखने लगी है। गांवों में फाग की जमातों ने फागुनी रंग जमाना शुरू कर दिया है। रसूलाबाद के धर्मगढ़ मंदिर परिसर में मुरारी लाल कुशवाहा की टीम बमन गए ते धान श्याम मथुरा में केसर बै आए पर थिरकती दिखी। बरीपाल निवासी रामरतन साहू बताते हैं कि अब पहले जैसा जोश युवाओं में नहीं दिखता। युवा फाग की जगह फिल्मी गानों में थिरकते हैं।
महाभारत में फॉग का जिक्र
स्थानीय लोगों का कहना है कि महाभारत के युद्ध से पहले भीम के पौत्र बरबरिक द्वारा फाल्गुन की ग्यारस को ही कृष्ण को शीश का दान दिया गया था। इसी दिन खाटू में भी मेला लगता है। इसमें पूरे देश से लाखों की संख्या में भक्त वहां जुटते हैं और खाटू श्याम के दर्शन करते हैं। इसी उपलक्ष्य में श्री श्याम जी महिला प्रचार मंडल द्वारा हर साल इसी दिन निशान यात्रा निकाली जाती है। इस यात्रा में लोग अबीर-गुलाल से रंग खेलते हैं और फाग के रंग नें यमुना के किनारे के गांव सराबोर हो जाते हैं। बरीपाल निवासी रामरतन बताते हैं कि आल्हा-ऊदल की नगर महोबा में भी फाग का उत्सव मनाया जाता था। ख्ुद आल्हा होली पर्व पर फाग गया करते थे। इसी के चलते बुंदेलखं डमें यह परम्परा आज भी जीवन्त है।
जहां फागों पर थिरकते दिखे
बरीपाल में मंडली की आगवाई रामरतन साहू के हाथों में है और उनका साथ एक दर्जन से ज्यादा युवा, बुजुर्ग दे रहे हैं। यमुना बेल्ट के ग्राम शाहजहांपुर के राजकिशेर शुक्ला की मंडली ने ’बन आए गोपी नाथ वैद्य बनवारी तथा मोहन नंदलाल बरसाने नहिं आए..’ आदि गीतों पर लोगों को झूमने पर मजबूर कर रही है। उनकी मंडली के गायक राकेश सिंह, ओकर सिंह जहां फांगों पर थिरकते दिखे, वहीं ढोलक वादक बाबू सिंह, मजीरा वादक उमा शंकर, झींका वादक राम सिंह की जोड़ी अजब रंग बिखेर रही है। राकेश सिंह ने बताया कि उनके बाबा फाग गाया करते थे। उन्हें एमपी के छतरपुर, सागर, रीवां, कटनी सहित अन्य जिलों में बुलाया जाता था। उनके निधन के साथ पिता ने विरासत को संभाली और उसे हम आगे ले जा रहे हैं।
शराफत भाई के ढोलक की थाप का जोड़ नहीं
बरीपाल में होली पर्व हिन्दू-मुस्लिम मिलकर मनाते और फाग गीत गाते हैं। शराफत भाई की ढोलक की थाप का जोड़ नही ंतो अफसाक की फाग की राग सुनने के लिए दूर-दराग से लोग आते हैं। शराफत भाई की मंडली ढोलक, मजीरे व झींके की साज पर ’फगुना तोरी अजब बहार गोरी मचल रही नैहर मां.’ पर थिरकती रही। शराफत कहते हैं कि सियासतदान चाहे जितनी कोशिश कर लें, पर हमें आपस में लड़ा नहीं पाएंगे। हमारे गांव में ***** भाईयों के साथ मुस्लिम समाज भी होली खेलता है और फाग गाकर लोगों को मंत्रमुग्ध करता है। शराफत ने बताया कि वह पिछले बीस सालों से होली पर्व पर फाग में ढोलक बजाते हैं और जो आनाज व पैसे मिलते हैं उसे गरीबों की बेटियों की शादी में दे देते हैं।