
सांकेतिक फोटो
कानपुर के बिठूर क्षेत्र की पारंपरिक माटीकला एक बार फिर चर्चा में है, जहां सदियों पुरानी मिट्टी की गुल्लकें अब नए और आधुनिक रूप में तैयार की जा रही हैं। इस पहल के तहत गुल्लकों को आकर्षक डिज़ाइन, चमकदार रंगों और बच्चों की पसंद के अनुरूप आकारों में ढाला जा रहा है। जिला प्रशासन और IIT Kanpur के संयुक्त सहयोग से चल रही इस पहल ने न सिर्फ कारीगरों को नई दिशा दी है, बल्कि स्थानीय कला को भी वैश्विक पहचान दिलाने की उम्मीद जगाई है।
जिला प्रशासन इस पहल को केवल एक उत्पाद विकास योजना के रूप में नहीं देख रहा, बल्कि इसे बच्चों में बचत की आदत और संस्कार विकसित करने वाले भावनात्मक अभियान के रूप में आगे बढ़ा रहा है। जिलाधिकारी ने बताया कि मिट्टी की गुल्लक बच्चों के लिए बचत की सबसे सरल और प्रभावी शुरुआत रही है। आज के समय में जब अनावश्यक खर्च तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे में बच्चों को आर्थिक अनुशासन सिखाना बेहद जरूरी हो गया है।
मुख्य विकास अधिकारी के अनुसार, इस परियोजना का उद्देश्य स्थानीय उत्पादों को आत्मनिर्भर बनाना है। बिठूर की माटीकला को आधुनिक बाजार से जोड़ने के लिए डिज़ाइन, पैकेजिंग और ब्रांडिंग पर विशेष काम किया जा रहा है। इससे न केवल उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है, बल्कि कारीगरों को बेहतर बाजार और आय के अवसर भी मिल रहे हैं।
IIT Kanpur के रोज़ी शिक्षा केंद्र प्रोजेक्ट के तहत कारीगरों को आधुनिक तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है। विशेषज्ञ टीम उन्हें नए डिज़ाइन और बाजार की मांग के अनुसार प्रशिक्षित कर रही है। डिजाइनरों द्वारा बच्चों के लिए कार्टून, पशु-पक्षी और पारंपरिक आकृतियों वाली गुल्लकें तैयार की जा रही हैं, जिससे उनकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
बिठूर के कुम्हारों का कहना है कि पहले मिट्टी की गुल्लकों की मांग लगातार घट रही थी, लेकिन नए डिज़ाइन और सरकारी सहयोग से अब फिर से बाजार में रुचि बढ़ी है। जिला प्रशासन ने संकेत दिया है कि इन गुल्लकों को सरकारी कार्यक्रमों में उपहार और स्मृति-चिह्न के रूप में भी शामिल किया जाएगा। इससे न केवल कारीगरों को रोजगार मिलेगा, बल्कि बिठूर की माटीकला को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान भी प्राप्त होगी।
Published on:
19 May 2026 05:54 pm
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