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राजस्थान के इस प्रसिद्ध पशु मेले पर ऐसा मंडरा रहा अस्तित्व का संकट

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राजस्थान के इस प्रसिद्ध पशु मेले पर ऐसा मंडरा रहा अस्तित्व का संकट

करौली. प्रदेश के प्रमुख दस पशु मेलों में शुमार करौली के पशु मेले का अस्तित्व संकट में है। यह मेला पशुओं की संख्या को देखते हुए वर्ष प्रति वर्ष सिमटता जा रहा है।

रियासतकाल से भरने वाले इस मेले की प्रदेश में खासी पहचान रही है। पशु पालन विभाग के बड़े मेलों में यह शामिल है। लेकिन पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो मेले में आने वाले पशुओं की संख्या लगातार कम हो रही है। विशेष रूप से गोवंश की संख्या में कमी आईहै।

हालांकि इस अवधि में उष्ट्रवंश की संख्या में वृद्धि तो हुई है, लेकिन मेले में आने वाले कुल पशुओं की संख्या कम होती जा रही है। आंकड़ों को देखें तो 6-7 वर्ष पहले मेले में 10 हजार से अधिक पशु आते थे। पशुपालन विभाग के अधिकारी अब गोवंश की संख्या में कमी आने को लेकर नियमों की जटिलता बताते हैं। लेकिन सच्चाई यह भी है कि पशुपालकों को पर्याप्त सुविधाओं के अभाव के चलते उनका मेले के प्रति रूझान कम हुआ है।

किस वर्ष, कितने पशु
शिवरात्रि मेले में पहले प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में प्रदेश के विभिन्न जिलों से विभिन्न वंश के पशु आते रहे हैं। इनकी प्रदेश के ही नहीं बल्कि उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश से आने वाले पशुपालक खरीदारी करते हैं।

वर्ष 2016 में शिवरात्रि पशु मेले में जहां कुल 6126 पशुओं की आवक हुईथी, वहीं 2017 में यह संख्या घटकर 4689 रह गई। इसके बाद गत वर्ष यानि 2018 में इस संख्या में और कमी आई और मेले में 4585 पशु आए।

इस बार तो स्थिति और भी खराब
पशुपालन विभाग की ओर से आयोजित किए जाने वाले करौली के शिवरात्रिपशु मेले के प्रति पशुपालकों में गत वर्षों तक जबरदस्त उत्साह नजर आता रहा है, लेकिन इस बार तो यह उत्साह भी नहीं दिख रहा।
पिछले वर्षों तक हर बार स्थिति यह रही है कि मेले के उद्घाटन की निर्धारित तिथि से पांच-सात दिन पहले से ही मेला मैदान पर पशुपालक पशुओं को लेकर आ जाते थे और पशुओं की खरीद-फरोख्त हो जाती। इतना ही नहीं अनेक पशुपालक तो रवानगी के लिए पैनल्टी रवन्ना चुकाकर पशु लेकर लौट जाते।

उद्घाटन तिथि आते-आते तो मेला मैदान में बहुत कम संख्या में पशु रह जाते हैं, लेकिन इस बार मेला मैदान पर यह स्थिति भी नहीं है। उद्घाटन के दिन तक भी मैदान पर करीब 350-400 पशु ही आए हैं। इससे मैदान ही खाली-खाली नजर आया।

इन स्थानों से आते हैं पशु
विभागीय सूत्रों के अनुसार मेले में ऊंट प्रदेश के नागौर, पाली, राजसमंद आदि जिलों से विशेष रूप से आते हैं। वहीं गौवंश करौली, धौलपुर, सवाईमाधोपुर व मध्यप्रदेश के कुछ इलाकों से लाए जाते हैं। जबकि मेले में पशु खरीदने के लिए राजस्थान के कई जिलों के अलावा मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश से आते हैं।

56 वर्ष से विभाग करा रहा आयोजन
प्रसिद्ध शिवरात्रि पशु मेले का आयोजन पशुपालन विभाग की ओर से किया जा रहा है। वर्ष 1964 से यह मेला विभाग के हाथों आया, तभी से मेले का आयोजन पशुपालन विभाग कर रहा है, उससे पहले नगरपालिका की ओर से मेले का आयोजन कराया जाता रहा।

56 वर्ष से पूजन करा रहे पंडित भी आहत
पशु मेले में पिछले 56 वर्ष से पंडित रामस्वरूप शुक्ल द्वारा पूजन कराया जाता है। जीवन के 85 बसंत देख चुके पंडित रामस्वरूप भी सिमटते जा रहे प्रसिद्ध पशु मेले की हालत को देख आहत हैं।

वे कहते हैं कि पहले मेले में कई दिन तक रौनक छाती थी। बड़ी संख्या में विभिन्न स्थानों से पशुपालक पशुओं को लेकर आते थे। साथ ही अनेक दुकानें भी मैदान पर लगती लेकिन अब वो बात नहीं।

यंत्रीकरण और नए नियम
यह सही है कि मेले में पशुओं की संख्या में उत्तरोतर कमी हो रही है। इसका प्रमुख कारण यंत्रीकरण है। इससे खेती में भी उपयोगिता कम हुई है। कुछ नए नियमों का लागू होना भी है। दस्तावेजों की भी अनिवार्यता है। इससे पशुपालकों का मेले के प्रति रूझान कम हुआ है। विभाग की ओर से सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा जाता है।
डॉ. बीएल मीना, अतिरिक्त निदेशक, पशुपालन विभाग भरतपुर