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संत देवप्रभाकर शास्त्री दद्दाजी हुए ब्रह्मलीन, शोक की लहर

दुनियाभर में 16 लाख से ज्यादा अनुयायी, दर्शन के लिए देशभर से कटनी पहुंच रहे शिष्य. आज दद्दाधाम में होगा अंतिम संस्कार.

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Pandit Devprabhakar Shastri Daddaji

पंडित देवप्रभाकर शास्त्री दद्दाजी

कटनी. जिले के छोटे से गांव कूड़ा मर्दानगढ़ में जन्मे करपात्री महाराज के शिष्य संत पं. देवप्रभाकर शास्त्री दद्दाजी 17 मई की शाम ब्रह्मलीन हो गए। विजयराघवगढ़ विधायक संजय पाठक ने ट्वीट कर उनके ब्रह्मलीन होने की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि गंगाराम अस्पताल दिल्ली में इलाज के बाद डॉक्टरों ने दद्दाजी को घर ले जाने की सलाह दी। उन्हे शनिवार शाम एयर एंबुलेंस से जबलपुर लाया गया और वहां से रात में ही दद्दाधाम स्थित निज निवास लेकर पहुंचे। दद्दाजी के लंग्स व किडनी में समस्या के कारण वे वेंटीलेंटर में थे। रविवार रात 8.27 बजे के बाद उन्होंने अंतिम सांस ली। दद्दाजी के दुनियाभर में 16 लाख अनुयायी हैं। स्वास्थ्य बिगडऩे की जानकारी लगते ही दर्शन के लिए कटनी पहुंचने का सिलसिला प्रारंभ हुआ।

पंडित देवप्रभाकर शास्त्री दद्दाजी IMAGE CREDIT: Raghavendra

रविवार दिन में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पत्नी साधना सिंह, खाद्य सहकारिता मंत्री गोविंद सिंह राजपूत, भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री कैशाल विजयवर्गीय, पूर्व ग्रहमंत्री भूपेंद्र सिंह बघेल, पूर्व मंत्री राजेंद्र शुक्ला, पूर्व शिक्षामंत्री अर्चना चिटनिस, पूर्वमंत्री लखन घनघोरिया, गोपाल भार्गव, फिल्म अभिनेता आशुतोष राणा, राजपाल यादव सहित बड़ी संख्या में विधायक और जनप्रतिनिधि व अधिकारी दद्दाधाम पहुंचे। दद्दाजी शिष्यमंडल के सदस्य संजीव श्रीवास्तव ने बताया कि उनका पार्थिव शरीर दद्दाधाम में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया है। सोमवार अपरान्ह अंतिम संस्कार दद्दाधाम में ही होगा।

वाराणसी में शिक्षा, शिवलिंग निर्माण यज्ञ के लिए देशभर में ख्याति
गृहस्थ संत पंडित देवप्रभाकर शास्त्री दद्दाजी का जन्म बहोरीबंद तहसील क्षेत्र के गांव कूड़ा मरदानगढ़ में पं. गिरधारीदत्त शास्त्री मां ललिता देवी के यहां बेटे के रूप में हुआ। दद्दाजी का कूड़ा गांव में घनश्याम बाग के नाम से आश्रम भी बना है, जहां पर अधिकांश दद्दाजी निवास करते थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद दद्दाजी ने नारायण संस्कृत महाविद्यालय कटनी से संस्कृत की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद वे वाराणसेय संस्कृत विश्व विद्यालय वाराणसी उप्र में वेद-वेदांगों का अध्ययन करने चले गए। महाविद्यालयों में प्राध्यापक रहकर अध्यापन कार्य कराया। युवा अवस्था से ही ज्ञान का प्रकाशपुंज फैलाने का काम दद्दाजी ने किया। दद्दाजी के तीन पुत्र, दो बेटियां, नाती-नातिनों ने भरा पूरा परिवार है। पत्नी जिज्जी कुछ माह पहले ही ब्रह्मलीन हुई हैं। पुत्र डॉ. अनिल त्रिपाठी, डॉ. सुनील त्रिपाठी, नीरज त्रिपाठी, पुत्री शशिदेवी पांडेय, अनीता देवी पांडेय हैं। दद्दाजी देशभर में 131 पार्थिव शिवलिंग निर्माण व रुद्राभिषेक, यज्ञ और सैकड़ों तीन दिवसीय पार्थिव शिवलिंग निर्माण करा चुके हैं। इंदौर में जब 93वां आयोजन हुआ तो गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ। इस दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान व कैलाश विजयर्गीय की मौजूदगी में प्रमाण पत्र से सम्मान कार्यक्रम आयोजित हुआ। दद्दाजी ने संत करपात्री महाराज से दीक्षा ली। गुरुमाता कुंतीदेवी का भी सानिध्य प्राप्त हुआ। गुरु आदेश को शिरोधार्य करते हुए दद्दाजी शिवशक्ति जागरण के वैश्विक प्रणेता बने। वैश्विक परिस्थिति से सामंजस्य के साथ लगातार सनातन धर्म की धर्मध्वजा को आगे बढ़ाते हुए सतत यज्ञ कार्य, असंख्य पार्थिव शिवलिंग निर्माण एवं महारुद्राभिषेक सहित अन्य धाॢमक आयोजन विश्व कल्याण के लिए किए।

पंडित देवप्रभाकर शास्त्री दद्दाजी IMAGE CREDIT: Raghavendra

मधुर वाणी और सहजता की प्रतिमूर्ति
दद्दाजी दयालु एवं प्रसंन्नचित स्वभाव, तपोनिष्ठ, सहज एवं सरल, सार्वभौमिक दृष्टि और समानता की नजर के प्रतिमूर्ति रहे। कथाओं व धर्मसंसद में धर्मउपदेश के माध्यम से बड़ी वाकपटुता से वे लोगों को उनकी कथनी और करनी एक जैसी रखने, माता-पिता की सेवा, सपने में भी पराए का अहित न करने व धर्मपथ की शिक्षा जनजन को अंतिम सांस तक देते रहे।

शिवलिंग निर्माण और रुद्राभिषेक से जुड़ते गए शिष्य
दद्दाजी शिवलिंग निर्माण और रुद्राभिषेक के आयोजन को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहे। बड़े-बड़े शहरों और महानगरों में दद्दाजी ने असंख पार्थिव शिवलिंग निर्माण एवं रुद्राभिषेक कराए। कटनी शहर से लेकर जबलपुर, इंदौर, भोपाल, उज्जैन,प्रयागराज, मुंबई, दिल्ली, शिरडी, बनारस, रामेश्वरम सहित अन्य महानगरों में 131 असंख्यपार्थिक शिवलिंग निर्माण हुए। इसके अलावा तीन दिवसीय पार्थिव शिविलंग निर्माण व यज्ञ का आयोजन कई बार उन्होंने करवाया।

खास-खास
- गुरजीकलां गांव में 1962 में पहली बार हुआ आयोजन, फागूराम बढ़ई ने कराई थी भागवत।
- देश और विशेष में तीन लाख से अधिक हैं दीक्षित शिष्य, 16 लाख से अधिक अनुयाई।
- दद्दाजी की खेती.किसानी में रही है विशेष रुचि, घनश्याम बाग में रहकर देखते थे खेती।
- धार्मिक आयोजनों में दद्दाजी किसी भी शिष्य से नहीं लेते थे राशि।
- बद्रीनाथ, अमरनाथ, रामेश्वरम, द्वारिकाधीश, गंगासागर, चित्रकूट, अयोध्या,पशुपतिनाथ, नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं दद्दाजी।
- 4 मई से 17 मई तक 1981 में 14 दिवस में कर चुके हैं नर्मदा परिक्रमा, 30 दिसंबर 2002 से 31 जनवरी 2003 तक की थी चार धाम की यात्रा।