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कवर्धा को जिला बनने में लगे 26 साल, सियासत ने रोकी थी राह… 6 जुलाई 1998 को ऐसे मिला था दर्जा

Kawardha News: कभी छोटा सा कमरदा तहसील कवर्धा बना और फिर जिला बन गया। आज यह जिला 27 वर्ष का युवा हो चुका है। लेकिन कवर्धा को जिले का दर्जा मिलना आसान नहीं था।

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कवर्धा को जिला बनने में लगे 26 साल (फोटो सोर्स- पत्रिका)

कवर्धा को जिला बनने में लगे 26 साल (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Chhattisgarh News: कभी छोटा सा कमरदा तहसील कवर्धा बना और फिर जिला बन गया। आज यह जिला 27 वर्ष का युवा हो चुका है। लेकिन कवर्धा को जिले का दर्जा मिलना आसान नहीं था। इसके लिए काफी संघर्ष करना पड़ा तब कही जाकर कवर्धा को 6 जुलाई 1998 को जिला घोषित किया।

कवर्धा कभी कवरदा कभी कमरदा कभी कवरधा कहलाता रहा। समय के साथ यह बदलता रहा। जिला पुरातत्व समिति के सदस्य आदित्य श्रीवास्तव ने जिले गठन के पूर्व की संपूर्ण जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि सन् 1983 में बीपी दुबे की अध्यक्षता में जिला पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया, जिसके द्वारा 25 मई 1998 व सिंहदेव समिति की अनुशंसा पर 30 जून 1998 को 16 नये जिलों की अनुशंसा की गई। परन्तु बेमेतरा की दावेदारी व साजा की आपत्ति के कारण राजनांदगांव जिले से कवर्धा तहसील और बिलासपुर जिले से पंडरिया तहसील को अपवर्जित कर तत्कालीन मध्यप्रदेश शासन के अधिसूचना पर 2 जुलाई 1998 द्वारा एक नए जिले का गठन कर कवर्धा को मुख्यालय नियत किया गया। उपरोक्त अधिसूचना के अनुसार सोमवार द्वादशी तिथि अनुराधा नक्षत्र 6 जुलाई 1998 को सूर्यदेव के प्रथम किरण के साथ कवर्धा जिला अस्तित्व में आया।

जिला गठन के बाद प्रथम कलेक्टर एसडी अग्रवाल को जिले को व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी दी गई और वर्तमान भोरमदेव आफि सर्स क्लब छीरपानी कालोनी को कलेक्ट्रेट बनाया गया। वहीं प्रथम पुलिस अधीक्षक पंकज श्रीवास्तव को सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई। अनुविभागीय अधिकारी सामान्य व तहसील कार्यालय पूर्व से ही रियासतकालीन ऐतिहासिक कचहरी में संचालित था।

Chhattisgarh News: धर्मगुरुओं को सानिध्य

विभिन्न धर्म गुरु शन्कराचार्य कृष्णबोधाश्रम, ब्रह्मानन्द सरस्वती, स्वामी करपात्री जी, निरंजनदेव तीर्थ, स्वामी स्वरूपानंद, स्वामी निश्चलानंद, महाराष्ट्र के संत तुकडोदास, तुर्किस्तान के पीर महबूब शाहदाता, जैन मुनि रतन मुनि, गुरु घासीदास जी, कबीरपंथ गुरु हकनाम साहब से लेकर प्रकाशमुनि नाम साहब तक का सानिध्य इस धर्मनगरी को मिला है। सरोजबाला व उमा भारती का बालपन में प्रवचन लाभ मिला। महान फ णिनाग वंशों का पवित्रतम स्थल के साथ-साथ पचराही विश्व का प्राचीनतम क्षेत्र रहा है।

….तो 52वीं वर्षगांठ मना रहे होते

जब 1971 में विशालकाय दुर्ग जिले का विभाजन करने की बात सामने आई तो कहा जाता है प्रशासनिक और दूरी की दृष्टि से सर्वप्रथम नाम १२३ किमी दूर कवर्धा को जिला योग्य मानकर विचार किया गया था। लेकिन उस समय राजनांदगांव के स्व.किशोरी लाल शुक्ला मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल में राजस्व मंत्री थे। उ

न्होंने राजनांदगांव जो कि दुर्ग जिले से मात्र 35 किमी पर है, उनके पक्ष में कांग्रेस के प्रमुख नेता स्व.हमीदुल्लाह खान को सहमत कर लिया कि दूसरी किश्त में कवर्धा को बना देंगे। साथ ही कवर्धा से लगातार रामराज्य परिषद का निर्दलीय विधायक होने से राजनैतिक दबाव भी नहीं बन पाया था। 26 जनवरी 1973 को राजनांदगांव जिला बना दिया गया। जबकि दूसरी किस्त का समय 26वर्ष तक नहीं आया।

हर तरह से परिपूर्ण जिला

27 वर्ष के युवा कवर्धा को मैकल पर्वत ने आधार दिया। हाफ , संकरी, आगर, फोंक, हालो, बंजर कर्ण, फेन, जमुनिया नदियों ने अपने पावन जल से सिंचित किया। जिले के मेहनतकश लोगों ने इसे संवारने में कोई कमी न की। दो शक्कर कारखाना से जिले की मिठास भी बढ़ गई क्योंकि किसानों को गन्ने की फसल से काफी फायदा हुआ। गुड़ फैक्टरियों की बाढ़ आ गई।