
बच्चों और किशोरों में बढ़ रहा स्क्रीन टाइम उन्हें बीमार बना रहा है। बच्चे ज्यादा नखरे दिखा रहे हों, तो नजरअंदाज न करें। ये उनके हिंसक बर्ताव और डिप्रेशन में जाने के प्राथमिक लक्षण हैं। मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग में रोज औसतन 60 मरीज आ रहे हैं। इनमें 30 युवा और 15 फीसदी बच्चे हैं। इनमें 50 फीसदी बच्चे और किशोर मानसिक अवसाद के शिकार हैं। डब्ल्यूएचओ ने भी 5 साल से कम उम्र के बच्चों के एक घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम को प्रतिबंधित किया है।
थोड़ी-थोड़ी देर के लिए दें मोबाइल
मनोरोग विशेषज्ञों के अनुसार, बिना मोबाइल बच्चों की पढ़ाई की कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन नियंत्रित करना जरूरी है। सौ मिनट का स्लॉट तय करें। उन्हें पार्ट—पार्ट में मोबाइल दें।
डेवलप करें ये आदतें
1. बच्चों की दिनचर्या में शारीरिक गतिविधियां जोड़ें।
2. किसी शिल्प का हिस्सा बनकर बच्चों को जोड़ें।
3. पारिवारिक गतिविधियां बढ़ाएं।
4. फोन के उपयोग के नियम बनाएं। इन नियमों को खुद भी मानें और बच्चों को उसका पालन करना सिखाएं।
किशोरों की ऐसी लत, चल रहा इलाज
पंधाना के किशोर ने लगातार पबजी खेला तो उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। खंडवा के एक किशोर से परिजनों ने मोबाइल लिया तो हिंसक हो गया। इटारसी का मोबाइल एडिक्ट युवक सुसाइड सिंड्रोम से ग्रसित हो गया।
एक्सपर्ट का कहना है
बच्चों-किशोरों को मानसिक अवसाद से बचाने 100 मिनट से ज्यादा मोबाइल न चलाने दें। स्पोट्र्स, डांस, आर्ट क्लासेस में बच्चों को व्यस्त रखें।
- डॉ. संजय इंग्ले, मनोरोग विशेषज्ञ, मेडिकल कॉलेज खंडवा
दुनिया में बच्चों के मोबाइल के उपयोग की स्थिति
- दक्षिण अफ्रीका - 09 घंटे
- फिलीपींस - 10 घंटे
- ब्राजील - 10 घंटे
- कोलंबिया - 10 घंटे ज्यादा समय
- जापान - 4.25 घंटे
- डेनमार्क - 5.16 घंटे
- चीन - 5.22 घंटे
- भारत - 3.5 घंटे
Updated on:
11 Feb 2024 09:44 am
Published on:
11 Feb 2024 09:36 am
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