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मनीष अरोरा
खंडवा. जिले की राजनीति मे अपना वर्चस्व रखने वाले कांग्रेस के तत्कालीन कद्दावर नेता ठा. शिवकुमारसिंह के दो समर्थकों में 25 साल पहले टिकट के लिए घमासान मचा था। वर्ष 1993 के उपचुनाव में कांग्रेस से युवा नेता परमजीतसिंह नारंग पाटू भैया का टिकट लगभग तय माना जा रहा था। युवाओं की भी ये ही मांग थी। पाटू भैया ने अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया था। नामांकन के अंतिम दिन अचानक वरिष्ठ नेता वीरेंद्र मिश्र बल्ली काकू बी-फार्म लेकर कलेक्टोरेट पहुंचे और अपना नामांकन दाखिल किया। ऐन वक्त पर पाटू भैया का टिकट कटने से समर्थकों के आक्रोश का सामना बल्ली काकू को करना पड़ा।
खंडवा की राजनीति में 1990 तक कांग्रेस का दबदबा रहा। 1990 में कांग्रेस के दबदबे को खत्म करते हुए हुकुमचंद यादव ने भाजपा को पहली बार जीत दिलाई। 1992 में विधानसभा भंग होने के बाद 1993 में उपचुनाव हुए। भाजपा ने विजयी प्रत्याशी हुकुमचंद यादव को मौका न देते हुए ब्राह्मण कार्ड खेला और पुरणमल शर्मा को प्रत्याशी बनाया। कांग्रेस की ओर से ठा. शिवकुमारसिंह गुट से पाटू भैया का नाम लगभग तय माना जा रहा था। युवाओं में खासी पकड़ रखने वाले पाटू भैया अपनी आक्रमक छवि के कारण भी लोगों की पसंद बने हुए थे। ठा. शिवकुमारसिंह की ओर से उन्हें हरी झंडी भी मिल गई थी। जिसके बाद वे कांग्रेस की ओर से अपना नामांकन भी दाखिल करा चुके थे। इस बीच लोगों ने उनके खिलाफ ठा. शिवकुमारसिंह के कान भरना शुरू कर दिए। पाटू भैया के विरोधियों का कहना था कि युवा नेता है, इसलिए इनकी जीत के कम ही चांस है। नामांकन के अंतिम दिन पाटू भैया अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ कलेक्टोरेट में मौजूद थे। तभी ठा. शिवकुमारसिंह गुट के दूसरे वरिष्ठ नेता बल्ली काकू बी-फार्म लेकर वहां पहुंचे। अपने नेता के कहने पर पाटू भैया ने नाम वापस लिया और कलेक्टोरेट में मौजूद आक्रोशित समर्थकों को अपना फैसला सुनाया। इस चुनाव में बल्ली काकू को हार का सामना करना पड़ा और इसके बाद से भाजपा ने इस सीट पर कभी हार नहीं देखी।
Published on:
20 Oct 2018 06:22 pm
