
जानिए आज कहां खुलेगा स्वर्ग का द्वार, कहां होगी सारी रात तांत्रिकों की साधना
कोलकाता. बीरभूम जिले का तारापीठ कौशिकी अमावस्या पर होने वाली विशेष पूजा व तंत्र क्रियाओं के लिए तैयार है। देश भर से हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंच चुके हैं। तांत्रिक महाश्मशान में डेरा डाल चुके हैं। यज्ञ, हवन, सिद्धि की तैयारियां जोरों पर हैं। अमावस्या लगते ही विश्व मंगल की कामना को लेकर विभिन्न मतों के तांत्रिक अपनी अपनी पद्धति से साधना में जुट जाएंगे। जो सारी रात चलेगी। यहां महाविद्या के जानकार, कुंडलनी जागृत करने वाले योगी योगिनी पहुंच चुके हैं। वहीं गृहस्थ अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए आ रहे हैं। तंत्र विद्या के जानकार बताते हैं कि कौशिकी अमावस्या की रात कुछ समय के लिए स्वर्ग का द्वार खुलता है।
शीघ्र सिद्धि मिलती है श्मशान में
तंत्र साधना में शीघ्र सिद्धि-प्राप्त करने के लिए श्मशान में साधना की जाती है। जाग्रत श्मशानों में साधना फलदायी होती है। उज्जैन तथा मणिकर्णिका घाट जाग्रत श्मशान हैं, जबकि बंगाल के बीरभूम जिले का तारापीठ श्मशान को महाश्मशान की संज्ञा दी जाती है। तंत्र साधना यहीं पराकाष्ठा पर पहुंचती है। यहां विराजी मां तारा सभी आपदाओं से, विपदाओं से तारने हैं। वे मृत्यु के पश्चात भी भक्तों को तारती हैं। शक्ति मातंगी के चरण कमल यहां के महाश्मशान में प्रतिष्ठित हंै । मान्यता है कि भगवान राम, बुद्ध, महावीर, ऋषि वशिष्ठ, विश्वामित्र, देवगुरु बृहस्पति, महर्षि दधीचि जैसे महाऋषियों ने इस स्थान पर साधनाएं कर सिद्धियां प्राप्त की थीं। महान तांत्रिक वामाक्षेपा जिसका अपभ्रंश वामाखेपा प्रचलित है , को यहां मां तारा ने स्वयं स्तन पान कराया था। तंत्र के षटकर्मों का अध्ययन इसी महाश्मशान में किया जाता है। कौशिकी अमावस्या पर यहां बड़े पैमाने पर तांत्रिक जुटते हैं। जिसे सिद्धि-प्राप्ति का वार्षिक महोत्सव भी कहा जाता है। जो भाद्रपद माह की अमावस्या पर होता है। इस महापर्व पर वरिष्ठ तांत्रिक अपने शिष्यों को यहां गुप्त तंत्र सिद्धियां दिलाने के लिए कठिनतम साधनाएं कराते हैं। यहां तंत्र साधिकाएं जिन्हें भैरवियां कहा जाता है, निवास करती हैं वे साधकों की सहायता करती हंै। इस स्थान पर अलग-अलग कामनाओं की पूर्ति के लिए तंत्र विधि से हवन किया जाता है।
शिव को कराया दुग्ध पान
मान्यताओं के मुतातबक देवी महा-काली ने हयग्रीव नमक दैत्य के वध के लिए नीला वर्ण धारण किया था। उनके उग्र स्वरूप को उग्र तारा का नाम दिया गया। शक्ति का यह स्वरूप सर्वदा मोक्ष प्रदान करने वाली तथा अपने भक्तों को संकटों से मुक्ति प्रदान करने वाली हैं। भगवान शिव के समुद्र मंथन के समय हलाहल विष पीने पर हो रही शारीरिक पीड़ा से मुक्ति के लिए मां तार ने माता के स्वरूप में शिव को अपना अमृतमय दुग्ध स्तन पान कराया था। जिसके कारण उन्हें पीड़ा से मुक्ति मिली। यहां देवी की आराधना-साधना मोक्ष प्राप्त करने के लिए तांत्रिक पद्धति से किए जाने की परंपरा है।
Published on:
29 Aug 2019 06:07 pm
