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हाथियों के इलाके में बिछाई जाएगी पटरी, रेल कॉरिडोर को लेकर वन विभाग के अफसर चिंतित, पढि़ए खबर क्या सोच रहे ये अफसर…

~ कुदमुरा, करतला रेंज में अधिग्रहीत हुए 23 में से 18 गांव हाथी प्रभावित क्षेत्र

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कोरबा

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Shiv Singh

Jun 25, 2018

हाथियों के इलाके में बिछाई जाएगी पटरी, रेल कॉरिडोर को लेकर वन विभाग के अफसर चिंतित, पढि़ए खबर क्या सोच रहे ये अफसर...

रेल कॉरिडोर से कई हाथी प्रभावित क्षेत्र होंगे प्रभावित, कहां जाएंगे हाथी, विभाग की बढ़ी चिंता

कोरबा. कोरबा से धरमजयगढ़ रेल कॉरिडोर के लिए सरकार ने 23 गांव की जमीन अधिग्रहित कर ली गई है। जिस जगह पर पटरी बिछेगी वह इलाका पूरी तरह से जंगल है। वर्तमान में हाथियों का झुंड जब भी गांव पहुंचता है वन विभाग का अमला उन्हीं जंगलों की तरफ झुंड को खदेड़ता है। विभाग के अफसर अब खुद चिंतित है कि कॉरिडोर बनने के बाद हाथियों को कहां खदेड़ा जाएगा।
कोरबा से धरमजयगढ़ के बीच ईस्ट रेल कॉरिडोर के तहत 62 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बिछनी है। इसके लिए जमीन का अधिग्रहण तक पूरा किया जा चुका है। वर्तमान में धरमजयगढ़ से लेकर खरसिया तक रेल लाइन बिछाने का काम चल रहा है। जिसे 2018 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके पूरे होते ही धरमजयगढ़ से कोरबा तक रेललाइन बिछाने का काम शुरू हो जाएगा। रेललाइन बिछाने के लिए जो रूट तय किया गया है। वह पूरी तरह से हाथी प्रभावित क्षेत्र है। दरअसल कोरबा का कुदमुरा-करतला रेंज व रायगढ़ जिले का छाल, बायसी वाला इलाका पूरी तरह से हाथी प्रभावित क्षेत्र है।

इन दोनों ही जगहों पर हाथियों का झुंड साल भर रहता है। इस 62 किलोमीटर लंबे प्रोजेक्ट का ७० फीसदी दायरा लगभग 40 किलोमीटर हाथी प्रभावित क्षेत्र की जद में आ रहा है। इस जंगल से हाथियों का झुंड गांव की तरफ आ जाता है। जिसे वन अमला खदेड़ कर वापस उसी जंगल की ओर भेजा जाता है। सवाल अब यह उठ रहा है कि जब रेल कॉरिडोर पूरी तरह से बन जाएगा। पेड़ो की कटाई कर दी जाएगी। जंगल का दायरा सिकुड़ जाएगा फिर ये झुंड आखिर जाएगा तो कहां ? वन विभाग के अफसर भी इससे चिंतित है कि अभी इतनी परेशानी है तो आने वाले दिनों में और कितनी दिक्कतें आएंगी।

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यहां के धान, महुआ व कटहल में न्यूट्रेशियन अधिक
वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक लंबे समय से हाथियों का झुंड इस पूरे इलाके में है। इसके पीछे एकमात्र वजह है कि क्षेत्र के धान, महुआ व कटहल में अधिक न्यूट्रेशियन है। जिससे हाथियों का झुंड लंबे समय से एक क्षेत्र में रहता है। दूसरी बड़ी वजह यहां के जंगल एक बड़ी मांंड नदी व तीन नालों से होकर गुजरती है जिसकी वजह से पानी की उपलब्धता अच्छी है जिसकी वजह से भी हाथियों का झुंड अपना ठिकाना नहीं बदलता।

दस साल में संख्या हुई पांच गुना, 10 से सीधे 50 औसत पहुंची
पिछले दस साल में हाथियों की संख्या में तीगुना का इजाफा हुआ है। 10 साल पहले हाथियों की संख्या औसतन 8 से 10 हुआ करती थी। जो कि अब बढ़ कर सीधे 50 से अधिक तक जा पहुंची है। पिछले तीन साल में कई बार ऐसी स्थिति बनी कि छाल से लेकर करतला रेंज तक हाथी एक ही जगह पर जमा हो जाते थे। जब हाथियों की संख्या सौ से पार पहुंच चुकी है। उसके बाद भी सरकार इसी क्षेत्र में कॉरिडोर बनाना चाहती है।

हाथी प्रभावित क्षेत्रों मेें इन गांव की जमीन अधिग्रहित
हाटी, मदवानी, चारपारा, नोनदहरा, टेंगामार, बोतली, नवापारा, बांधापाली, घिनारा, डोंगानाला, फत्तेगंज, केरवाद्वारी सहित अन्य।
-जमीन चिंहित करते समय पूरी कोशिश की गई है कि घने जंगलों की बजाय मध्यम स्तर के जंगल में कॉरिडोर बनाया जाएगा। केन्द्र सरकार के नए नियम के मुताबिक जिन जंगलों पर हाथियों का आवागमन होता है उस जगह पर ओबी भी बनेगा। हाथियों को कहीं से परेशानी नहीं होने दी जाएगी। एस वेंकटाचलम्, डीएफओ, कोरबा