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6 महीने पहले घर में आई थी खुशियां, खूनी हाईवे ने सबकुछ कर दिया तबाह, कौन हैं इन मौतों का जिम्मेदार ?

एक साल में 40 से ज्यादा हादसे, 17 से ज्यादा की जान  
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कोटा

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Rajesh Tripathi

Apr 18, 2019

kota news

6 महीने पहले घर में आई थी खुशियां, खूनी हाईवे ने सबकुछ कर दिया तबाह, कौन हैं इन मौतों का जिम्मेदार ?

केबलनगर . राष्ट्रीय राजमार्ग 52 पर केबलनगर पुलिया पर गुरुवार सुबह करीब सवा 9 बजे हुई ट्रक व कार की जोरदार भिड़ंत में कॅरियर प्वाइंट यूनिवर्सिटी की दो फैकल्टी की मौत हो गई, जबकि दो जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं। जानकारी के अनुसार आलनियां स्थित कॅरियर पॉइंट यूनिवर्सिटी में फैकल्टी (शिक्षक) के रूप में कार्यरत कोटा निवासी आशीष गौतम, आदिल कुरैशी, ललित श्रीवास्तव व अजहरुद्दीन अंसारी कार से सुबह करीब सवा 9 बजे यूनिवर्सिटी में पढ़ाने जा रहे थे। इसी दौरान झालावाड़ से कोटा की ओर जा रहे टमाटर भरे ट्रक से केबलनगर पुलिया पर जोरदार टक्कर हो गई। हादसे के बाद कार लगभग सवा सौ फीट दूर तक घिसटती चली गई। क्षतिग्रस्त कार में बुरी तरह फंसे चारों युवकों को ग्रामीणों ने बाहर निकाला तथा निजी वाहनों से कोटा में निजी चिकित्सालय में पहुंचाया। वहां आशीष गौतम व अजहरुद्दीन अंसारी का दम टूट गया।

6 माह पहले घर में आई थी खुशियां
हादसे में शिकार हुए अजरूद्दीन अंसारी की 2017 में शादी हुई थी और 6 महीने पहले ही उनके घर में बेटी के रूप में खुशियां आई थी। गौतम के परिजनों का भी इस हादसे के बाद सदमे में है। जैसे ही हादसे की सूचना यूनिवर्सिटी के छात्रों को लगी, सभी घटनास्थल पर जमा हो गए। जिसने भी देखा वह ठिठक गया। यूनिवर्सिटी में शोक की लहर दौड़ गई।

कौन हैं इन मौतों का जिम्मेदार
सालों तक सार्वजनिक विभाग और वन विभाग में स्वीकृति को लेकर देरी और फिर हाईवे बना रही कंपनी की लापरवाही ने कई जिंदगियां बर्बाद कर दी है। आंकड़ों पर गौर करें तो सवा साल के अंतराल में कोटा-झालावाड़ रोड पर 40 हादसे हो चुके हैं, जिनमें 15 लोगों ने अपनी जान गवाईं लगभग 30 लोग घायल हो गए।

जिस कंपनी को निर्माण का काम दिया गया है उसने कई जगह से मार्ग को डायवर्ट कर रखा है। कई जगह कच्चा रोड है तो संकेतक भी नहीं बना रखें है।

शैक्षणिक जोन होने के बाद भी नहीं ली सुध
कोटा-झालावाड़ रोड पर और रानपुर में 10 से ज्यादा बड़े शैक्षणिक संस्थान है जहां हजारों विद्यार्थी और कर्मचारी रोज इस रोड से गुजरते हैं। कई बार ये संस्थान, प्रशासन को स्थिति सुधारने के लिए पत्र लिख चुके हैं लेकिन हालात जस के तस हैं।