
सफेद हाथी हुआ कोटा थर्मल, '100 रुपए का कोयला मंगाने के लिए 70 रुपए की लागत'
कोटा. प्रदेश सरकार कोटा थर्मल को पहले ही 'सफेद हाथीÓ घोषित कर चुकी है। इसीलिए इस पावर प्लांट को अपग्रेड कर कभी बचाने की कोशिश नहीं की गई।
राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) एक दशक से थर्मल पावर प्लांटों को अपग्रेड करने में लगा हुआ है। छबड़ा में 250-250 मेगावाट की चार इकाइयां स्थापित थी, लेकिन जब इन पर बंदी की आंच आती दिखी तो निगम ने 660 मेगावाट की दो यूनिटें स्थापित कर इस प्लांट को बंद होने से बचा लिया। ऐसे ही कालीसिंध में भी 600 मेगावाट की दो सुपर क्रिटिकल यूनिटें स्थापित कर दी गईं। जबकि कोटा थर्मल अच्छी हालात में होने के बाद भी इसे अपग्रेड नहीं किया गया।
कोयले की खपत कोटा थर्मल की पहली और दूसरी यूनिट मैकेनिकल हैं। यानी इन्हें ऑपरेट करने में ज्यादा लोगों की तो जरूरत पड़ती ही है। इसके साथ ही कोयले की खपत भी सुपर क्रिटिकल तकनीकी पर आधारित यूनिटों से ज्यादा बैठती है। कोटा थर्मल में एक यूनिट बिजली बनाने के लिए 650 से 800 ग्राम कोयले की खपत होती है। वहीं सुपर क्रिटिकल यूनिटों में 500 ग्राम से भी कम कोयले से एक यूनिट बिजली बना ली जाती है। खदानों से औसतन 100 रुपए का कोयला कोटा तक मंगाने के लिए निगम को करीब 70 रुपए का भाड़ा रेलवे को देना पड़ता है।
सस्ती बिजली बनी मुसीबत
कोटा थर्मल में कुल विद्युत उत्पादन का करीब 10 फीसदी हिस्सा इकाइयों को चालू रखने में ही खर्च हो जाता है। जबकि सुपर क्रिटिकल प्लांटों में यह खर्च अधिकतम 5 से छह फीसदी है। जबकि 110 मेगावाट की एक यूनिट चलाने के लिए जितने कार्मिकों की जरूरत होती है उतने में ही 660 मेगावाट की बड़ी यूनिट चल जाती है। जिसके चलते कोटा थर्मल में औसतन एक यूनिट बिजली 3.50 रुपए से 4.50 रुपए में बनती है। जबकि सुपर क्रिटिकल प्लांटों से यही बिजली 2.80 रुपए प्रति यूनिट में मिल जाती है। इसी के चलते प्रदेश सरकार कोटा थर्मल की पुरानी इकाइयों को बंद कर छबड़ा और कालीसिंध में बड़ी इकाइयां स्थापित करने के साथ साथ जैसलमेर में 25 हजार मेगावाट का सोलर एवं विंड पॉवर प्रोजेक्ट भी ला रही है।
Published on:
19 Feb 2020 06:55 pm
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