
कोटा . न बिजली का बिल दे पा रहे न पानी का। बच्चों की फीस और पढ़ाई की बात ही कहां करें, जब खाने को घर में दाने ही नहीं। सुबह का बंदोबस्त हो जाए तो शाम का भगवान मालिक है। शाम का जुगाड़ हो जाए तो सुबह की चिंता। बजरी पर रोक के बाद बाजार से बजरी क्या गायब हुई मजूदरों की तो रोजी-रोटी छिन गई। बजरी के अभाव में निर्माण कार्य ठप हुए तो मजूदरों को पेट भरने तक के लाले पड़ गए। ऐसे में कई मजूदर तो गांवों की ओर पलायन कर गए जबकि कई छुटपुट काम कर पेट भर रहे हैं। राजस्थान पत्रिका ने कई मजदूरों से बात की तो उनका दर्द उभर कर सामने आ गया।
कोटा शहर में हर साल हाड़ौती समेत मालवा क्षेत्र से मजदूर रोजगार के लिए आते हैं। इस बार भी शहर में करीब 50 हजार श्रमिक मजदूरी कर अपना व परिवार का पेट पाल रहे हैं। अधिकतर श्रमिक यहां किराए का कमरा लेकर रहते हैं। कोटा में केशवपुरा स्थित आल्हाउदल पार्क, बोरखेड़ा, विज्ञाननगर, गुमानपुरा, कुन्हाड़ी, गोबरियाबावड़ी, डीसीएम, शिवपुरा, रेलवे स्टेशन चौराहों पर रोजाना सुबह बड़ी तादात में मजदूर रोजगार के लिए एकत्र होते हैं। यहां से ठेकेदार व लोग उन्हें दिहाड़ी मजदूरी पर ले जाते हैं। लेकिन पिछले दिनों बजरी पर रोक के बाद बाजार में बजरी का टोटा पड़ गया। ऐसे में निर्माण कार्यों विराम लग गया। इसका सीधा असर मजदूरों पर पड़ा। बजरी के अभाव में सरकारी निर्माण कार्यों से लेकर भवन निर्माण कार्य तक अटक गए। ऐसे में मजदूरों के लिए रोजगार के लाले पड़ गए। दो से तीन माह से श्रमिक ठाले बैठे हैं। कुछ श्रमिकों ने तो अब बेलदारी छोड़कर चौकीदारी करना शुरू कर दिया है। श्रमिकों ने बताया कि काम नहीं मिलने के कारण कर्जा बढ़ गया। परिवारों का पेट भरना मुश्किल हो गया है। कई मजदूर तो गांवों की ओर पलायन कर गए।
परिवार का पेट कैसे भरें
सिविल के मिस्त्री नंदलाल का कहना है कि मेरे परिवार में छह जने हैं। ठेकेदार काम नहीं दे रहा, अन्य जगह भी निर्माण कार्य ठप है तो काम नहीं मिल रहा। बेरोजगार ही घूम रहे हैं। पत्नी नि:शक्त है। इस कारण वह भी कमा नहीं पाती है। कर्जा लेकर काम चला रहे हैं।
बेरोजगार हो गए बेटे
प्रेमनगर निवासी बेलदार छीतरलाल का कहना है कि मेरा एक पुत्र मकानों में टाइल्स लगाता है। दूसरा पुताई करता है। निर्माण कार्य नहीं होने से दोनों को काम नहीं मिल रहा। पिछले दिनों बिजली का बिल जमा नहीं हुआ तो घर की बिजली काट दी गई। अब अंधेरे में रहना पड़ रहा है।
परिवार को भेजा गांव
कारीगर धर्मराज का कहना है कि तीन माह से काम नहीं मिल रहा। इस कारण ब"ाों को दो जून की रोटी भी कमा कर नहीं खिला पा रहा। बच्चों की फीस जमा नहीं हुई। कर्जा हो गया है। इस कारण परिवार को गांव में भेज दिया।
काम अटका, पैसे भी अटके
इन्द्रागांधी निवासी कांन्टे्रक्टर बबलू का कहना है कि नगर तीन माह से बजरी नहीं आ रही है। मकानों की छते सेटरिंग बंधी है। छतें नहीं डल पा रही है। काम पूरा नहीं होने के कारण मकान मालिक भी पैसा नहीं दे रहे। मजदूर भी पैसा मांग रहे हैं। ऐसी स्थिति में पैसा कहा से लाए।
बेलदारी छोड़ कर रहा चौकीदारी
बेलदारी करता था, लेकिन अब काम नहीं मिल रहा। मजदूरों को तो भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। पेट भरना भी मुश्किल हो रहा। परिवार का पेट पालने के लिए अब चौकीदारी कर रहा हूं।
मोतीशंकर, कारीगर
बिल्डिंग मेटेरियल एसोसिएशन के अध्यक्ष पंकज लोढ़ा का कहना है कि बजरी पर रोक के चलते कोटा शहर में 7 सौ करोड़ के निर्माण कार्य ठप पड़े हैं। साथ ही अन्य निर्माण सामग्री का भी उठाव नहीं हो रहा। श्रमिक दो माह से अधिक समय से बेरोजगार हैं।
ये काम हुए प्रभावित
बजरी नहीं मिलने से मकान व सड़कों का काम अटका पड़ा है। मकानों की चुनाई, छत, सरिए, ईंट बेचने, पुताई, फर्शी लगाना आदि काम प्रभावित हो रहा है।
- फैक्ट फाइल
- कोटा शहर
- 50 हजार मजदूर काम करते हैं
- 7 सौ करोड़ के निर्माण कार्य अटके
- 10 जगहों पर लगती है मजदूर मंडी
Updated on:
22 Jan 2018 09:42 pm
Published on:
22 Jan 2018 08:50 pm
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