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कैसे निखरेगी खेल प्रतिभा, जब स्कूलों का हो ये हाल

सरकारी स्कूलों की हालत दयनीय, पैसों की मोहताज स्कूली खेल प्रतिभाएं, खेल सुविधाएं तो दूर, प्रशिक्षक तक उपलब्ध नहीं हैं।

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कोटा

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ritu shrivastav

Oct 07, 2017

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पैसों की मोहताज स्कूली खेल प्रतिभाएं

सरकारें भले ही जिले, राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिताएं आयोजित कर खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने का दम भरती हों, हकीकत इससे परे है। सरकारी स्कूलों की हालत दयनीय है। खेल सुविधाएं तो दूर, प्रशिक्षक तक उपलब्ध नहीं हैं। बच्चा अपने स्तर जिला स्तर की प्रतियोगिता जीत भी ले तो आगे खेलने के लिए कोई पैसा नहीं। सरकारी स्कूलों के पास खेल के नाम पर कोई बजट नहीं आता और न ही इन स्कूलों में बच्चे पढ़ाने वाले ज्यादातर अभिभावक यह खर्च उठाने में सक्षम होते हैं।

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एकत्रि‍त राशि तय करती खिलाडि़यों की संख्या

मजबूरी में या तो भामाशाहों का सहारा लिया जाता है या स्कूल स्टाफ से चंदा। चयनित खिलाडी ज्यादा हों तो उनके खर्चे के अनुसार राशि जुटती भी नहीं है। एेसे में एकत्र राशि के मुताबिक ही खिलाडि़यों की संख्या तय कर दी जाती है। और, रुपयों के अभाव में कई खिलाडि़यों की प्रतिभा दबी रह जाती है। चंदा न होने पर कई स्कूल प्रतियोगिता में खेलने बच्चे भेजते ही नहीं।

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स्कूलों के हाल का ताजा उदाहरण

रामावि नया गांव से जिला स्तर पर अंडर 17-19 व 14 आयु वर्ग में 22 खिलाडि़यों का चयन हुआ। इन्हें केकड़ी व सीकर में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता खेलने भेजा। रुपयों के लिए भामाशाहों से प्रयास किया लेकिन नहीं मिले। 44 हजार रुपए विद्यालय स्टाफ ने दिए। पहले भी 7500 रुपए देकर स्टाफ ने तीन खिलाडि़यों को राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेने कर्नाटक भेजा।

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संसाधन के आभाव में बच्चे निखर नहीं पाते

राउप्रावि अमरकुआ से पिछली बार भामाशाहों के सहयोग से बच्चों को खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने भेजा गया था। इस बार किसी बच्चे ने प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया। कार्यवाहक प्रधानाचार्य सुरेश चावला ने बताया कि खेल के लिए कोई अतिरिक्त बजट नहीं होने दिक्कत आती है। संसाधन नहीं होने से शिक्षक भी बच्चों को निखार नहीं पाते।

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इतना आता है खर्च

राज्य स्तर के खिलाड़ी के आने-जाने का किराया, लोकल ट्रेवल्स, मेडिकल किट, नाश्ते व खाने का खर्च, खेल किट आदि के लिए औसत एक खिलाड़ी पर एक से डेढ़ हजार रुपए खर्च आ जाता है। सरकारी स्कूलों में कक्षा 5 वीं से 12 वीं तक विद्यार्थियों से नाममात्र क्रीड़ा शुल्क लेते हैं। यह सामान्य वर्ग का 5 रुपए व आरक्षित वर्ग का 2 रुपए है। प्राथमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों से शुल्क नहीं लिया जाता।

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बजट नहीं विभाग के पास

शारीरिक शिक्षा के उप जिला शिक्षा अधिकारी बजरंग खरडि़या ने इस विषय बात की और बताया कि विभाग के पास खेल बजट नहीं होता। स्टेट प्रतियोगिता में भामाशाहों की मदद लेते हैं। जिला स्तरीय प्रतियोगिता के लिए विभाग 5 हजार रुपए आयोजक स्कूल को देता है।