
महात्मा गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई। उसके बाद उनकी अस्थियों को देश भर में अलग- अलग जगह विसर्जित किया गया। उसी क्रम में 11 फरवरी 1948 को स्वतंत्रता सेनानी नगेन्द्र बाला, महात्मा गांधी की अस्थियां कोटा लेकर भी पहुंची थीं। नगेन्द्र बाला राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र की पहली महिला थीं, जिन्होंने महिलाओं में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार किया। महात्मा गांधी के हत्यारे का नाम था - नाथूराम गोडसे। हैरत की बात है कि आज तक उनकी अस्तियां विसर्जित होने की राह देख रही हैं। इसके पीछे का रहस्य जानकर आप भी चौंक जााएंगे।

महात्मा गांधी की आज (30 जनवरी) 76वीं पुण्यतिथि है। 1948 में कोटा के चंबल नदी में भी महात्मा गांधी की अस्थियों का विसर्जन किया गया था, इस जगह का नाम विसर्जन स्थल रखा गया है। महात्मा गांधी की सबसे बड़ी स्मृति के रूप में यहां स्थापित विसर्जन स्थल में शिलालेख भी बनाए गए हैं।

1948 में महात्मा गांधी की अस्थियों को देश भर में कई जगह विसर्जित किया गया था लेकिन नाथूराम की अस्थियां विर्सजित होने का आज भी राह देख रही हैं। इसकी वजह जानकर आप भी हैरान हो जाएंगे।

1949 को अदालत ने गोडसे को मृत्युदंड की सजा सुनाई। फिर 15 नवंबर, 1949 को फांसी से पहले गोडसे के एक हाथ में गीता और अखंड भारत का नक्शा था तो दूसरे हाथ में भगवा झंडा। कहा जाता है कि फांसी का फंदा पहनाए जाने से पहले गोडसे ने 'नमस्ते सदा वत्सले' का उच्चारण किया था और साथ ही नारे भी लगाए थे। नाथूराम गोडसे की अस्थियां आज तक नदी में प्रवाहित नहीं की गई। वो पुणे के शिवाजी नगर इलाके में स्थित एक इमारत के कमरे में सुरक्षित रखी हुई हैं। उस कमरे में गोडसे के अस्थि कलश के अलावा उसके कुछ कपड़े और हाथ से लिखे नोट्स भी संभालकर रखे गए हैं।

नाथूराम गोडसे की भतीजी हिमानी सावरकर ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि फांसी के बाद गोडसे का शव भी उन्हें नहीं दिया गया बल्कि सरकार ने खुद घग्घर नदी के किनारे उनका अंतिम संस्कार कर दिया। इसके बाद उनकी अस्थियां हमें एक डिब्बे में भरकर दे दी गई थीं।

हिमानी सावरकर के मुताबिक, नाथूराम गोडसे ने अपनी अंतिम इच्छा के तौर पर अपने परिवार वालों से कहा था कि उनकी अस्थियों को तब तक संभाल कर रखा जाए जब तक कि सिंधु नदी स्वतंत्र भारत में समाहित न हो जाए और फिर से अखंड भारत का निर्माण न हो जाए। ये सपना पूरा हो जाने के बाद मेरी अस्थियों को सिंधु नदी में प्रवाहित कर दिया जाए। यही वजह है कि गोडसे के परिवार ने आज तक उनकी अस्थियों को संभाल कर रखा है और उनके सपने के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं।

यह वहीं पिस्तल है जिससे महात्मा गांधी को गोली मारी गई थी। महात्मा गांधी की आज (30 जनवरी) 76वीं पुण्यतिथि है। इस बीच, स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के पोते रंजीत सावरकर ने अपनी नई किताब में महात्मा गांधी और नाथूराम गोडसे को लेकर सनसनीखेज दावा किया है। रंजीत सावरकर ने दावा किया कि महात्मा गांधी की मौत नाथूराम गोडसे की पिस्तौल से चली गोली से नहीं हुई थी। उन्होंने कहा कि जांच ठीक से नहीं होने के कारण गांधीजी की हत्या से नेहरू परिवार को फायदा हुआ।

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर के मुताबिक, नाथूराम गोडसे का क्रॉस वेरिफिकेशन भी नहीं किया गया। महात्मा गांधी की मौत नाथूराम गोडसे द्वारा चलाई गई पिस्तौल की गोली से नहीं हुई थी। क्योंकि उनके पिस्तौल से चली गोली का आकार अलग था। मैंने यह सब अध्ययन किया है।

अपना पक्ष रखते हुए गोडसे ने अदालत में कहा था, 'गांधीजी ने जो देश की सेवा की है, उसका मैं आदर करता हूं और इसलिए उनपर गोली चलाने से पहले मैं उनके सम्मान में झुका भी था, लेकिन चूंकि उन्होंने अखंड भारत के दो टुकड़े कराए, इसीलिए मैंने उन्हें गोली मारी।'